डेस्क : प्रॉपर्टी बाजार में बड़े निवेश करने वालों के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। दिल्ली स्थित आयकर अपीलीय अधिकरण (आईटीएटी) ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि बिल्डर द्वारा दिया गया हर डिस्काउंट या रिबेट टैक्स के दायरे में नहीं आता।
लग्जरी फ्लैट पर करोड़ों का डिस्काउंट
मामला गुरुग्राम के एक हाई-एंड रियल एस्टेट सौदे से जुड़ा है। एक खरीदार ने लगभग 23.13 करोड़ रुपये में फ्लैट खरीदा, जबकि उसकी घोषित कीमत करीब 32.95 करोड़ रुपये थी। यानी लगभग 9.8 करोड़ रुपये की छूट बिल्डर द्वारा दी गई, जो समय पर भुगतान और तय शर्तों से जुड़ी थी।
आयकर विभाग ने उठाए सवाल
इतने बड़े डिस्काउंट को देखते हुए आयकर विभाग ने इसे “अन्य स्रोतों से आय” मानते हुए टैक्स लगाने की कोशिश की। विभाग का तर्क था कि यह असामान्य छूट है और इसमें किसी प्रकार की विशेष व्यवस्था हो सकती है। साथ ही, खरीदार को सेक्शन 54एफ के तहत मिलने वाली छूट भी देने से इनकार कर दिया गया।
आईटीएटी का स्पष्ट रुख
मामला अधिकरण में पहुंचने पर ट्रिब्यूनल ने विभाग की दलील को खारिज कर दिया। अपने फैसले में कहा गया कि यह छूट पहले से तय कॉन्ट्रैक्ट का हिस्सा थी और पूरी तरह एक व्यावसायिक व्यवस्था थी। इसे “वास्तविक आय” नहीं माना जा सकता, इसलिए इस पर टैक्स लागू नहीं होगा।
स्टांप ड्यूटी वैल्यू भी बनी आधार
अधिकरण ने यह भी कहा कि यदि खरीद मूल्य स्टांप ड्यूटी वैल्यू से अधिक है, तो ऐसे मामलों में टैक्स लगाने का आधार कमजोर हो जाता है। इस केस में स्टांप ड्यूटी वैल्यू करीब 14.68 करोड़ रुपये थी, जबकि वास्तविक सौदा इससे कहीं अधिक पर हुआ था।
सेक्शन 54एफ में भी राहत
ट्रिब्यूनल ने खरीदार को सेक्शन 54एफ के तहत टैक्स छूट देने का भी निर्देश दिया। फैसले में स्पष्ट किया गया कि रजिस्ट्रेशन से अधिक महत्वपूर्ण पजेशन और भुगतान है। साथ ही, पत्नी को प्रॉपर्टी गिफ्ट करने या को-ओनरशिप होने से छूट पर कोई असर नहीं पड़ता।
निवेशकों के लिए क्या संकेत?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला बड़े रियल एस्टेट निवेशकों और होमबायर्स के लिए अहम मार्गदर्शन देता है। इससे स्पष्ट होता है कि हर तरह का वित्तीय लाभ आय नहीं होता, खासकर जब वह किसी वैध व्यावसायिक समझौते का हिस्सा हो।













देश
राज्य-शहर
विदेश
बिजनेस
मनोरंजन
जीवंत
