नई दिल्ली: रोहिंग्या समुदाय से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार और याचिकाकर्ता, दोनों के समक्ष कई कड़े प्रश्न रखे। अदालत ने साफ कहा कि जब तक रोहिंग्याओं का कानूनी दर्जा स्पष्ट नहीं होता, तब तक उनके अधिकारों पर चर्चा संभव नहीं। मुख्य न्यायाधीश ने सीधा सवाल किया—“क्या भारत ने कभी रोहिंग्याओं को शरणार्थी घोषित किया? और यदि नहीं, तो क्या घुसपैठियों के लिए हम रेड कार्पेट बिछाएं?”
क्या रोहिंग्या ‘शरणार्थी’ हैं?—CJI का बड़ा सवाल
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमल्या बागची की पीठ दिल्ली में दायर एक हैबियस कॉर्पस याचिका पर सुनवाई कर रही थी। आरोप है कि मई 2024 में दिल्ली पुलिस ने कुछ रोहिंग्या व्यक्तियों को हिरासत में लिया था और तब से उनका कुछ पता नहीं। याचिका में सिर्फ इतना कहा गया है कि अगर उन्हें वापस भेजा जाए तो प्रक्रिया कानून के अनुरूप हो।
सुनवाई की शुरुआत में ही CJI ने केंद्र से पूछा—
“भारत सरकार का कौन-सा आदेश है जो उन्हें शरणार्थी घोषित करता है? ‘शरणार्थी’ एक विधिक शब्द है। यदि कोई व्यक्ति अवैध रूप से सीमाएँ लांघकर घुसता है, तो क्या उसे यहां रखने की कोई बाध्यता बनती है?”
पीठ ने आगे कहा कि यदि वे कानूनी तौर पर भारत में रहने के अधिकारी नहीं हैं, तो क्या संवेदनशील सीमाओं से आए किसी घुसपैठिए का स्वागत किया जाए?
“पहले अवैध प्रवेश, फिर अधिकारों की मांग?”—CJI
CJI ने और भी सख्त टिप्पणी की—
“पहले सुरंग खोदकर या बाड़ काटकर घुस आते हैं, फिर कहते हैं कि अब भारत के कानून हमें खाना, घर और बच्चों की शिक्षा दें। क्या हम कानून को इस तरह मोड़ना चाहते हैं?”
उन्होंने यह भी कहा कि भारत में पहले से करोड़ों गरीब नागरिक हैं, जिनकी समस्याएं प्राथमिकता होनी चाहिए।
साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि अवैध प्रवेश के बावजूद किसी को भी थर्ड डिग्री या अमानवीय व्यवहार नहीं दिया जा सकता।
याचिकाकर्ता: “हम अधिकार नहीं, सिर्फ प्रक्रिया की मांग कर रहे”
याचिकाकर्ता की वकील ने साफ किया कि वे रोहिंग्याओं के लिए विशेष अधिकार नहीं मांग रहीं।
उनकी मांग सिर्फ इतनी है कि निर्वासन हो तो कानूनी प्रक्रिया के मुताबिक हो—ठीक वैसे ही जैसा सुप्रीम कोर्ट ने 2020 के सलीमुल्लाह मामले में कहा था।
“भारत दुनिया की धर्मशाला नहीं”—SC की पूर्व टिप्पणियाँ
अदालत ने पहले भी कहा था कि भारत हर दिशा से आने वाले शरणार्थियों के लिए “धर्मशाला” नहीं बन सकता।
मई में कोर्ट ने रोहिंग्याओं पर एक अन्य याचिका में यह भी टिप्पणी की थी कि उन्हें समुद्र में फेंकने जैसी बातें ‘किस्सागोई’ लगती हैं।
सरकार का तर्क: यह PIL प्रभावित व्यक्ति द्वारा क्यों नहीं?
सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि PIL किसी प्रभावित रोहिंग्या ने नहीं बल्कि तीसरे पक्ष ने दायर की है। इस पर याचिकाकर्ता की वकील का कहना था कि PIL में ‘लोकस स्टैंडी’ का सवाल लागू नहीं होता।
पीठ ने कहा कि यह मुद्दा कई लंबित मामलों से जुड़ा है, इसलिए इसे व्यापक रूप से सुना जाएगा। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि बिना कानूनी वैधता वाले विदेशी नागरिकों के मामलों में कई संवेदनशील और जटिल परिस्थितियाँ शामिल होती हैं।













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