डेस्क : उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले सियासी हलचल तेज हो गई है। भाजपा को सत्ता से चुनौती देने के लिए विपक्षी दल अपने-अपने पारंपरिक वोटबैंक के दायरे से बाहर निकलकर नए सामाजिक समीकरण साधने की कोशिश में जुट गए हैं। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी—दोनों ही लंबे समय से सत्ता से दूर हैं और ऐसे में भाजपा के खिलाफ मजबूत मुकाबले की रणनीति तलाश रही हैं।
इसी क्रम में बसपा सुप्रीमो मायावती ने गुरुवार को अपने 70वें जन्मदिन के मौके पर राजनीतिक तौर पर अहम संकेत दिए। उन्होंने साफ किया कि बसपा सिर्फ चुनाव लड़ने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि सत्ता में वापसी के लक्ष्य के साथ मैदान में उतरेगी। इसके लिए पार्टी की रणनीति दलित कोर वोटबैंक के साथ-साथ अपर कास्ट, खासकर ब्राह्मण समाज को साधने की दिखी।
‘हमारी सरकार में ब्राह्मणों का हुआ सम्मान’
लखनऊ स्थित बसपा प्रदेश मुख्यालय में मीडिया को संबोधित करते हुए मायावती ने हाल ही में भाजपा ब्राह्मण विधायकों की लखनऊ में हुई बैठक का जिक्र किया। उन्होंने दावा किया कि योगी आदित्यनाथ सरकार में ब्राह्मणों की स्थिति संतोषजनक नहीं है। मायावती ने कहा कि बसपा सरकार के दौरान ब्राह्मण समाज को सम्मान और भागीदारी मिली थी।
उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा ही नहीं, बल्कि सपा और कांग्रेस में भी ब्राह्मण समाज की उपेक्षा हुई है। मायावती ने कहा कि बसपा ऐसी पार्टी है, जिसने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य समेत सभी वर्गों और धर्मों का सम्मान किया है और भविष्य में भी करेगी।
दलित–ब्राह्मण समीकरण की वापसी की कोशिश
राम मंदिर आंदोलन के बाद से उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों का बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ रहा है। हालांकि विपक्ष समय-समय पर यह दावा करता रहा है कि मौजूदा सरकार में ब्राह्मण समाज असंतुष्ट है। ऐसे में मायावती का बयान दलित–ब्राह्मण गठजोड़ को फिर से सक्रिय करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
यह वही सामाजिक समीकरण है, जिसके सहारे बसपा ने 2007 में पूर्ण बहुमत हासिल किया था। उस चुनाव में बसपा को 206 सीटें मिली थीं और मायावती पांच साल तक मुख्यमंत्री रहीं। उस दौर में पार्टी के वरिष्ठ नेता सतीश चंद्र मिश्रा को भी अहम जिम्मेदारी दी गई थी।
मुस्लिम वोटबैंक पर भी नजर
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बसपा को यह भी पता है कि केवल दलित–ब्राह्मण समीकरण से भाजपा को चुनौती देना आसान नहीं होगा। इसके लिए मुस्लिम वोटबैंक का साथ भी जरूरी है। पिछले चुनावी रुझानों को देखें तो मुस्लिम मतदाता आमतौर पर उस दल या गठबंधन के साथ जाते हैं, जो भाजपा को सीधी टक्कर देता नजर आता है।
इसी संदर्भ में कांग्रेस के साथ संभावित गठबंधन की अटकलें भी तेज हुई हैं। मायावती ने जन्मदिन के मौके पर किसी गठबंधन से इनकार तो नहीं किया, लेकिन शर्त रखी कि सहयोग तभी होगा जब अपर कास्ट वोटों के ट्रांसफर की ठोस गारंटी मिले। इससे संकेत मिलते हैं कि बसपा संभावित रूप से कांग्रेस के साथ मिलकर नया सामाजिक समीकरण गढ़ने की कोशिश कर सकती है।
भाजपा के लिए कितनी बड़ी चुनौती?
मायावती की यह रणनीति भाजपा के लिए सियासी चुनौती बन सकती है। पिछले कई चुनावों में अपर कास्ट वोट भाजपा की जीत का अहम आधार रहा है—चाहे वह यूपी की सरकार हो या केंद्र की सत्ता। यदि बसपा अपर कास्ट वोटों में सेंध लगाने में आंशिक रूप से भी सफल होती है, तो इसका असर भाजपा की चुनावी गणित पर पड़ सकता है।
जन्मदिन के मंच से ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ के नारे को दोहराकर मायावती ने साफ कर दिया है कि बसपा एक बार फिर व्यापक सामाजिक आधार के साथ सत्ता में वापसी की रणनीति पर काम कर रही है। अब देखना यह होगा कि यह दांव आगामी चुनाव में कितना असर दिखा पाता है।













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