डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में मतदाता सूची के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) को लेकर निर्वाचन आयोग (ECI) की मंशा पर सवाल उठाए हैं। गुरुवार को मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची की पीठ ने आयोग से स्पष्ट रूप से पूछा कि इस पूरी प्रक्रिया को शुरू करते समय क्या नागरिकता का निर्धारण ही मुख्य उद्देश्य था। यह सुनवाई बिहार में 24 जून, 2025 को जारी उस अधिसूचना को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर हुई, जिसके तहत मतदाता सूची में व्यापक संशोधन किया गया था।
कोर्ट ने चुनाव आयोग द्वारा ‘प्रवास’ (Migration) को आधार बनाए जाने पर भी टिप्पणी की। पीठ ने कहा, “आमतौर पर ‘प्रवास’ का अर्थ कानूनी रूप से एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने से होता है। एक राज्य से दूसरे राज्य में प्रवास करना संवैधानिक अधिकार है। आपकी अधिसूचना में सीमा पार से होने वाले या अवैध प्रवास का स्पष्ट जिक्र नहीं है।” अदालत ने कहा कि यदि आयोग अंतर-राज्यीय प्रवास या गलत प्रविष्टियों के आधार पर इस संशोधन का बचाव कर रहा है तो फिर नागरिकता का बड़ा मुद्दा इसमें फिट नहीं बैठता।
20 साल बाद क्यों हुआ विशेष पुनरीक्षण?
चुनाव आयोग के वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी और मनिंदर सिंह ने बताया कि बिहार में 2003 के बाद कोई ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ नहीं हुआ था। पिछले दो दशकों में केवल ‘सारांश संशोधन’ किए गए, जिसमें मतदाता की स्व-घोषणा को ही नागरिकता का आधार माना जाता था और गहन जांच नहीं की जाती थी। आयोग ने कहा कि शहरीकरण और प्रवास के कारण जनसांख्यिकीय स्थितियों में बड़े बदलाव आए हैं, जिसके मद्देनजर यह कदम आवश्यक था।
2003 के नागरिकता संशोधन अधिनियम का हवाला
आयोग के वकील ने 2003 के नागरिकता (संशोधन) अधिनियम का उल्लेख करते हुए कहा कि इस कानून ने नागरिकता साबित करने के लिए माता-पिता की नागरिकता जैसे कड़े प्रमाण मांगे थे। आयोग के अनुसार, वर्तमान पुनरीक्षण इस कानूनी ढांचे को लागू करने का सही अवसर था। जब कोर्ट ने पूछा कि क्या यह कानून ही संशोधन का मुख्य कारण था, तो आयोग ने इसे स्वीकार किया।
66 लाख नाम हटाए, पर प्रभावित चुप क्यों?
चुनाव आयोग ने याचिकाकर्ताओं की मंशा पर भी सवाल उठाए। आयोग के अनुसार, बिहार में इस प्रक्रिया के दौरान 66 लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए, लेकिन इनमें से किसी ने भी अपनी शिकायत लेकर आयोग या अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाया। आयोग ने इसे ‘बिना ठोस आधार की छानबीन’ करार दिया और कहा कि केवल कुछ संगठनों की शिकायतों के आधार पर पूरी प्रक्रिया पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।
कोर्ट ने यह स्वीकार किया कि अब तक किसी प्रभावित व्यक्ति ने अपील नहीं की, लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य केवल यह समझना है कि इस संशोधन के पीछे आयोग की वास्तविक मंशा क्या थी। इस मामले की अगली सुनवाई 28 जनवरी को होगी।












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