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Home आराधना-साधना

व्यक्ति स्वयं अपने सुख दुःख का कर्ता : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

योगक्षेम वर्ष के संदर्भ में आत्मकर्तृत्ववाद को गुरूदेव ने किया व्याख्यायित

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March 8, 2026
in आराधना-साधना
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व्यक्ति स्वयं अपने सुख दुःख का कर्ता : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

लाडनूं :अहिंसा यात्रा प्रणेता शांतिदूत युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के पावन सान्निध्य में आज ज्ञान, दर्शन और वैराग्य की त्रिवेणी प्रवाहित हुई। मुख्य प्रवचन में आचार्य श्री ने जैन दर्शन के आत्मकर्तृत्ववाद की व्याख्या की। आज का दिवस तेरापंथ धर्मसंघ के पंचम अधिशास्ता, ‘वीतराग कल्प’ आचार्य श्री मघवागणी के महाप्रयाण दिवस के रूप में भी विशेष रहा, जहां गुरुदेव ने उनका पुण्य स्मरण किया। इसके साथ ही, ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ के अवसर पर आचार्य श्री ने धर्मसंघ और समाज में महिलाओं के आध्यात्मिक व सर्वांगीण विकास की प्रेरणा प्रदान की। गुरूदेव ने इस अवसर पर मुमुक्षु रुचिका (बाड़मेर) की अर्ज पर साधु प्रतिक्रमण सीखने का आदेश प्रदान किया।

सुधर्मा सभा के भव्य प्रांगण में धर्म देशना फरमाते हुए गु ने कहा – जैन धर्म के सिद्धांतों में आत्मवाद एक बहुत बड़ा तत्व है और इसी में आत्मकर्तृत्ववाद का एक बड़ा घोष है कि सुख और दुख इन दोनों को मैंने ही किया है और मुझे ही उसका फल भोगना है। कोई ईश्वर मुझे सुख-दुख देने वाला नहीं है। दुनिया में चलता है कि मारने वाला भगवान है और बचाने वाला भगवान है, पर हकीकत यह है कि मरना और बचना यह सब अपने ही कर्मों के कारण है। यदि हमारा आयुष्य कर्म अनपरिवर्तनीय जिसे बीच में बदला या खंडित नहीं किया जा सकता है, तो भूकंप आ जाए, भयंकर बाढ़ आ जाए या एक्सीडेंट हो जाए, कोई बाल भी बांका नहीं कर सकेगा। तीर्थंकरों आदि का अनुष्य अनपरिवर्तनीय होता है। व्यक्ति दूसरों पर थोपता है, यह गलत है। हमें यह चिंतन करना चाहिए कि हमारी आत्मा के द्वारा कोई भी ऐसी प्रवृत्ति न हो जिससे हम दुख का संवेदन करें। हम प्रमाद से दूर रहें और जागरूकता से धर्म का आचरण करते हुए आगे बढ़ें।

गुरुदेव ने आगे फरमाया कि आज चैत्र कृष्णा पंचमी है, जो हमारे धर्मसंघ के पंचम आचार्य, वीतराग कल्प मघवागणी का महाप्रयाण दिवस है। वे बाल्यावस्था में लाडनूं में ही दीक्षित हुए थे और उन्हें जयाचार्य प्रवर जैसे प्रज्ञा पुरुष के सानिध्य में रहने का मौका मिला। मघवागणी ने जयाचार्य के युवाचार्य के रूप में उनके आगम कार्यों में बहुत सहयोग किया। वे इतने शांत, कोमल और अजातशत्रु थे कि उन्होंने एक प्रसंग में अपने गुरू जयाचार्य की डांट और उपालंभ को भी भरी सभा में अत्यंत समता और विनय भाव से सहन किया। मघवागणी तेरापंथ धर्म संघ के प्रथम संस्कृत विद्वान भी माने जाते हैं। उनका युवाचार्य काल ज्यादा और आचार्य काल कम रहा, परंतु उनका जीवन और उनकी साधना हमें निरंतर प्रेरणा देती है।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के संदर्भ में गुरूदेव ने प्रेरणा देते हुए कहा कि हमारे धर्मसंघ में गुरुदेव तुलसी के विशेष अवदान से साध्वी समाज, समणी समुदाय का बहुत विकास हुआ है। तेरापंथ महिला मंडल का अवदान महिला जाति के लिए उपकार है। महिलाएं आध्यात्मिक, धार्मिक हर क्षेत्र में अपना विकास करती रहें यह मंगल कामना है।

प्रवचन के उपरांत आचार्य श्री महाश्रमण जी के पावन सानिध्य में शासन श्री साध्वी विद्यावती जी (प्रथम) की स्मृति सभा का आयोजन किया गया। गुरुदेव ने बताया कि साध्वी विद्यावती जी ने विक्रम संवत 2008 में गुरुदेव तुलसी के मुखारविंद से दीक्षा ग्रहण की थी। उन्होंने लगभग 48 वर्षों तक साध्वी केसर जी के साथ रहकर ज्ञानार्जन और उत्कृष्ट सेवा कार्य किए। वे अनेक आगमों को कंठस्थ करने वाली, शिल्प कला में निपुण और डॉक्टरी सेवा में भी दक्ष साध्वी थीं। गत 3 मार्च 2026 को सादुलपुर (राजगढ़) में उनका देवलोक गमन हो गया। गुरुदेव ने उनकी आत्मा के उर्ध्वारोहण की मंगल कामना की। परिषद ने चार लोगस्स का ध्यान कर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

स्मृति सभा में मुख्यमुनि श्री महावीर कुमार जी, साध्वीप्रमुखा श्री विश्रुतविभा जी ने अपने भाव व्यक्त किए। सादुलपुर आएं श्रावक समाज एवं साध्वीश्री ने संसारपक्षीय ज्ञातिजनों ने गीत और विचारों के माध्यम से भावांजलि प्रस्तुत की।

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