लाडनूं : जैन विश्व भारती परिसर में योगक्षेम वर्ष सम्पन्न कर रहे जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी की सन्निधि में प्रतिदिन हजारों की संख्या में श्रद्धालु उमड़ रहे हैं। गत दो से दिन तीनों में मानों सूर्योदय के पहले से ही श्रद्धालुओं को जो हुजूम उमड़ता, वह मानों देर रात तक उमड़ा हुआ था। अपने आराध्य के जन्मोत्सव व पट्टोत्सव के प्रसंग में हजारों-हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं ने दर्शन, सेवा व उपासना का लाभ प्राप्त किया है।
नित्य की भांति सोमवार को सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ के मध्य मंच पर विराजमान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के मुख्य प्रवचन कार्यक्रम का शुभारम्भ किया। साध्वीवृंद ने प्रज्ञा गीत का संगान किया। साध्वी लब्धिश्रीजी, साध्वी संघप्रभाजी, साध्वी गुप्तिप्रभाजी, समणी निर्मलप्रज्ञाजी, मुनि सुमतिकुमारजी, साध्वी पंकजश्रीजी, साध्वी रचनाश्रीजी, साध्वी काव्यलताजी, समणी चैतन्यप्रज्ञाजी, मुनि अर्हत्कुमारजी, साध्वी गवेशषणाश्रीजी ने आचार्यश्री को वर्धापित किया। साध्वी रतिप्रभाजी आदि साध्वियों ने गीत के माध्यम से अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी। साध्वी हिमश्रीजी, समणी मंजूप्रज्ञाजी व मुनि जम्बूकुमारजी (सरदारशहर) ने अपनी अभिव्यक्ति दी।
युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘कषाय से क्यों बचें?’ को व्याख्यायित करते हुए कहा कि हमारे चेतना जगत में कषाय भी विद्यमान है। वर्तमान में जो सभी जीवों की संसारी अवस्था है, उसको बनाए रखने में सक्षम आधार कषाय होता है। कर्मों की आय जिसके द्वारा होती है, वह कषाय होता है। कर्म बंध कराने में कषाय का बहुत बड़ा योगदान होता है। क्रोध, मान, माया और लोभ-ये चार कषाय होते हैं। प्रश्न हो सकता है कि इन कषायों से क्यों बचना चाहिए।
शास्त्र में बताया गया है कि कषायों के कारण जीव अधोगति की ओर चला जाता है। इसलिए कषायों से बचने का प्रयास हो। अधोगति में जाने का कारण क्रोध है। अधोगति में जाने से बचना है तो आदमी को अपने गुस्से पर नियंत्रण रखने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को आवेश से बचने का प्रयास करना चाहिए। योग के साथ कषाय न जुड़े, ऐसा प्रयास होना चाहिए। बिना कोई गुस्सा किए अपनी बात कह सके, ऐसी साधना बहुत अच्छी बात हो सकती है। आदमी को अपने गुस्से पर नियंत्रण और मन को शांत बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। अहंकार से भी जीव अधम गति की ओर जाता है। इसलिए जहां तक संभव हो अहंकार से भी बचने का प्रयास करना चाहिए। जीवन में विनम्रता हो, सादगी, सुन्दर व्यवहार हो तो अहंकार से बचा जा सकता है। लोभ करने वाले के तो इस लोक में भय तो होता ही है, परलोक में भी उसे भय सताता है। इसलिए आदमी को लोभ से यथासंभव बचने का प्रयास करना चाहिए।
कुल मिलाकर सार बात है कि कषाय के कारण आत्मा का पतन होता है, इसलिए आदमी को क्रोध, मान, माया और लोभ रूपी कषायों से बचने का प्रयास करना चाहिए। रखना हो तो प्रमोद भावना रखने का प्रयास करना चाहिए।
आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त साध्वी शुभ्रयशाजी, साध्वी मंगलयशाजी, साध्वी शुभप्रभाजी, मुनि पारसकुमारजी, साध्वी कर्तिकयशाजी, साध्वी ऋद्धिप्रभाजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। साध्वी शांतिलताजी, साध्वी पूनमप्रभाजी, साध्वी श्रेष्ठप्रभाजी ने गीत का संगान किया। मुनि पृथ्वीराजजी, मुनि श्रेयांसकुमारजी, साध्वी मंदारप्रभाजी, साध्वी शताब्दीप्रभाजी, साध्वी विज्ञप्रभाजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मण्डल की राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती सुमन नाहटा ने अपनी अभिव्यक्ति दी।













मुख्य समाचार
देश
राज्य-शहर
विदेश
बिजनेस
मनोरंजन
जीवंत
