लाडनूं : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी जैन विश्व भारती परिसर में योगक्षेम वर्ष का मंगल प्रवास कर रहे हैं। आचार्यश्री के वर्ष भर विराजमान होने से तेरापंथ धर्मसंघ के सभी प्रमुख उत्सवों का केन्द्र-सा बना हुआ है। देश-विदेश से पहुंचने वाले श्रद्धालु अपने आराध्य के निकट, सेवा, दर्शन, उपासना का लाभ उठा रहे हैं।
शनिवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘तपोधन महासुखी’ को विवेचित करते हुए कहा कि आगम में सुख की चर्चा की गई है। एक सुख साधु का होता है, जो त्यागी है और एक सुख भोगी आदमी का होता है। यहां विशेष रूप से यह बताने का प्रयास किया गया है कि जो काम-भोग और भौतिक वस्तुओं से प्राप्त होने वाला जो सुख लगता है, वह वास्तव में दुःख को बढ़ावा देने वाले होते हैं। वे दुःख से जुड़े हुए होते हैं। इन्द्रिय विषयों के भोग तत्काल में तो कुछ अच्छे लग सकते हैं, आगे के परिणाम भयावह होते हैं, दुःख देने वाले होते हैं।
आदमी को केवल तत्काल पर ही नहीं, परिणाम पर विचार करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को परिणामदर्शी बनने का प्रयास करना चाहिए। कभी कोई चीज शरीर के अच्छी हो सकती है, किन्तु आत्मा के लिए अच्छी नहीं हो सकती और जो कोई चीज आत्मा के लिए अच्छी होती है तो वह शरीर के लिए अच्छा नहीं होता। काम-भोग में अज्ञानियों को आनंद आता है अथवा जो सामान्य वर्ग से होते हैं, उन्हें इन्द्रिय भोगों और कामों में ही आनंद की अनुभूति होती है। ये काम-भोग सुख नहीं, वस्तुतः दुःख देने वाले ही होते हैं।
साधु के लिए बताया गया है कि साधु का धन तप है, योग साधु का धन है और श्रम भी साधु का धन होता है। साधु को उपशांत होना चाहिए। उपशम साधुत्व का मानों सार होता है। क्रोध, मान, माया और लोभ, जिसके पतले पड़ गए हों, हल्के पड़ गए हों, वह साधु होता है। सरल, भद्र, सेवाभावी, विनीत, साधना में जागरूक साधु का दर्शन करने मात्र से ही आत्मा का लाभ हो सकता है। ऐसे साधुओं का दर्शन ही मानों लाभकारी हो सकता है। साधु तो मानों तपोधन होता है। तपोधन साधुओं को प्राप्त होने वाले सुख कामी और भोगी मनुष्यों को प्राप्त नहीं हो सकता। काम-भोग वाला सुख बाह्यान्तर सुख होता है और साधना से मिलने वाला सुख आभ्यन्तर सुख होता है। साधु को यह आंतरिक सुख प्राप्त हो सकता है। तपोधन, उपशम, शीलगुण सम्पन्न साधुओं को प्राप्त होने वाला आत्मिक सुख होता है।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं को अपनी जिज्ञासाओं को प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया तो अनेक चारित्रात्माओं ने अपनी जिज्ञासाएं अपने आराध्य के समक्ष प्रस्तुत कीं तो आचार्यश्री ने उनकी जिज्ञासाओं को उत्तरित किया। आचार्यश्री ने परीक्षा देने वाली साध्वियों के लिए मंगलपाठ उच्चरित किया। तदुपरान्त साध्वी पीयूषप्रभाजी ने अपनी अभिव्यक्ति देते हुए अपनी सहवर्ती साध्वियों संग गीत का संगान किया। श्री निलेश बाफना ने गीत का संगान किया। बालक सम्यक ने अपनी बालसुलभ प्रस्तुति दी।













देश
राज्य-शहर
विदेश
बिजनेस
मनोरंजन
जीवंत