नई दिल्ली : देश में अल्पसंख्यकों की परिभाषा और उनके अधिकारों को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। इस मुद्दे पर केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरण रिजिजू और एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के बीच तीखी बयानबाजी देखने को मिली है।
मामला उस समय शुरू हुआ जब एक कार्यक्रम में किरण रिजिजू ने देश में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि भारत में अल्पसंख्यक समुदायों को पर्याप्त संवैधानिक सुरक्षा प्राप्त है और वे कई देशों की तुलना में बेहतर स्थिति में हैं। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि यदि भारत की मुस्लिम आबादी को एक देश की जनसंख्या माना जाए, तो यह विश्व की बड़ी आबादी वाले देशों में शामिल हो सकती है।
इस बयान के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ तेज हो गईं।
असदुद्दीन ओवैसी ने इस टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताते हुए सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक तीखा सवाल करते हुए कहा—“७९.८ प्रतिशत बड़ा है या १४ प्रतिशत?” उनका इशारा देश में बहुसंख्यक और मुस्लिम आबादी के अनुपात की ओर था।
ओवैसी ने यह भी आरोप लगाया कि सरकार अल्पसंख्यकों की संवैधानिक परिभाषा और उनके अधिकारों को लेकर स्पष्ट नीति नहीं रखती और कई बार उनके हितों की अनदेखी की जाती है।
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि भारत में “अल्पसंख्यक” की परिभाषा राष्ट्रीय स्तर पर तय की जानी चाहिए या राज्यों के स्तर पर, और अनुच्छेद ३० के तहत मिलने वाले शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों की व्याख्या किस प्रकार की जाए।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा केवल आंकड़ों का नहीं है, बल्कि संवैधानिक व्याख्या, सामाजिक प्रतिनिधित्व और पहचान की राजनीति से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।













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