डेस्क : भारतीय सिनेमा के महानायक अमिताभ बच्चन का ‘एंग्री यंग मैन’ रूप हिंदी फिल्म इतिहास का वह अध्याय माना जाता है, जिसने नायक की पारंपरिक परिभाषा को पूरी तरह बदल दिया। 1970 और 80 के दशक में उनके द्वारा निभाए गए किरदारों ने सामाजिक असंतोष, भ्रष्ट व्यवस्था और आम आदमी की पीड़ा को पर्दे पर सशक्त आवाज दी।
उस दौर में जब हिंदी फिल्मों का नायक आदर्शवादी और रोमांटिक छवि में अधिक दिखाई देता था, अमिताभ बच्चन ने एक ऐसे युवा की भूमिका प्रस्तुत की जो अन्याय के विरुद्ध खड़ा होता है और व्यवस्था से सीधा टकराव करता है। इसी कारण उन्हें सिनेमा जगत में ‘एंग्री यंग मैन’ के रूप में पहचान मिली।
फिल्म समीक्षकों का मानना है कि इस छवि के निर्माण में लेखक जोड़ी सलीम-जावेद की महत्वपूर्ण भूमिका रही, जिनकी कहानियों ने ‘विजय’ जैसे किरदारों को जन्म दिया और हिंदी सिनेमा को नई दिशा प्रदान की।
सात फिल्मों ने गढ़ा ‘एंग्री यंग मैन’ का चेहरा
अमिताभ बच्चन के करियर की कई फिल्मों ने इस छवि को मजबूत किया, जिनमें कुछ फिल्में आज भी मील का पत्थर मानी जाती हैं—
जंजीर (1973)
भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ खड़े एक ईमानदार पुलिस अधिकारी की कहानी, जिसने अमिताभ बच्चन के करियर को नई पहचान दी।
दीवार (1975)
दो भाइयों के जीवन संघर्ष और नैतिकता बनाम अपराध की टकरावपूर्ण कथा, जो हिंदी सिनेमा की क्लासिक फिल्मों में शामिल है।
त्रिशूल (1978)
पिता के अन्याय के खिलाफ बेटे के संघर्ष और प्रतिशोध की भावनात्मक कहानी।
काला पत्थर (1979)
कोयला खदानों में मजदूरों के शोषण और संघर्ष को केंद्र में रखकर बनी सामाजिक पृष्ठभूमि की फिल्म।
लावारिस (1981)
पहचान और अपनत्व की खोज में भटकते एक युवक की मार्मिक कहानी।
शक्ति (1982)
पिता और पुत्र के बीच विचारों और सिद्धांतों के टकराव पर आधारित प्रभावशाली फिल्म।
अग्निपथ (1990)
बदले और पीड़ा से भरी यह फिल्म अमिताभ बच्चन के सबसे तीव्र और गंभीर किरदारों में गिनी जाती है।
सिनेमा की सोच में आया बदलाव
विशेषज्ञों का कहना है कि इन फिल्मों ने हिंदी सिनेमा में नायक की अवधारणा को बदल दिया। अब हीरो केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहा, बल्कि वह समाज की विसंगतियों के खिलाफ खड़ा होने वाला व्यक्ति बन गया।













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