जयपुर : जैन मुनि श्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने कहा कि सह-अस्तित्व, शांतिपूर्ण सहवास और विकास का वास्तविक आधार सामंजस्य है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जहाँ अनेक व्यक्ति साथ रहते हैं, वहाँ शांत और व्यवस्थित जीवन के लिए परस्पर समन्वय अनिवार्य होता है।
निर्माण नगर स्थित एक निजी विद्यालय के संबोधि सभागार में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री ने उदाहरण के माध्यम से समझाया कि जैसे चलने के लिए एक पैर आगे बढ़ता है और दूसरा पीछे रहता है, फिर यह क्रम बदलता रहता है, उसी प्रकार जीवन और समाज की गति भी संतुलन और तालमेल से ही संभव होती है। यदि शरीर के अंगों में ही सामंजस्य न हो तो गति असंभव हो जाती है, ठीक वैसे ही प्रकृति और समाज की सभी व्यवस्थाएँ भी समन्वय पर आधारित हैं।
कार्यक्रम में मुनि श्री संभव कुमार जी महाराज ने भी प्रेरणादायक विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जैसे बिना काट-छाँट के दरवाजे और खिड़कियाँ नहीं बनतीं, और बिना सिलाई के वस्त्र तैयार नहीं होते, वैसे ही जीवन भी बिना सामंजस्य और समन्वय के सुचारु रूप से नहीं चल सकता। उन्होंने कहा कि आज विश्व में व्याप्त अशांति का मूल कारण पारस्परिक समन्वय की कमी है, और पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय तथा वैश्विक समस्याओं का समाधान केवल सहयोग और संतुलन से ही संभव है।
धर्मसभा की शुरुआत तीर्थंकर चन्द्रप्रभु की स्तुति में भक्ति गीतों के संगान से हुई। प्रवचन में उदारता के महत्व पर भी प्रकाश डाला गया। कार्यक्रम का समापन शरण सूत्रों की मंगल ध्वनि के साथ किया गया।













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