लाडनूं : तेरापंथ की राजधानी लाडनूं में स्थित जैन विश्व भारती के सुरम्य परिसर में विराजमान जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में देश-विदेश से श्रद्धालुओं के पहुंचने का नित्य क्रम लगा हुआ है। आचार्यश्री सहित चार सौ से अधिक चारित्रात्माओं के दर्शन व सेवा का लाभ मिलना मानों श्रद्धालुओं के लिए बोनस के समान लग रहा है। गर्मी का प्रकोप हो अथवा, तेज आंधी या वर्षा, आचार्यश्री के प्रवास स्थल के आसपास बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की उपस्थिति देखी जा सकती है। इतना ही नहीं सूर्योदय के पूर्व से लेकर सूर्यास्त के बाद तक भी श्रद्धालु अपने आराध्य आसपास ही दर्शन, सेवा व उपासना का लाभ उठाने में रत दिखाई देते हैं। आचार्यश्री के पवित्र आभावलय में बैठकर और समय-समय पर मंगलपाठ आदि का श्रवण कर श्रद्धालु निहाल हो जाते हैं। योगक्षेम वर्ष के मंगल प्रवास में यह दृश्य मानों नित्य प्रति ही देखने को मिल रहा है। दूसरी ओर प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में भी श्रद्धालु अपनी गुरु की अमृतवाणी के श्रवण का लाभ प्राप्त कर रहे हैं।
सोमवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘भोग का कटुक विपाक’ को विवेचित करते हुए कहा कि यह जगत आत्मा और कर्म से मिलाजुला है। आदमी बाहर की दुनिया को तो कुछ देख सकता है, लेकिन पूरी दुनिया को देखना भी कठिन है तो फिर भीतरी जगत को देखना कितना संभव हो सकता है। भीतर के जगत में कार्मण शरीर और आत्मा को आंखों से देख पाना तो मानों साधारणतया संभव नहीं है। साधना की गहराई में जाने वाले को भीतर के जगत का कुछ ज्ञान हो तो हो सकता है। किसी-किसी को जाति स्मृति ज्ञान भी उपलब्ध हो सकता है।
पिछले जन्म का ज्ञान होने से किसी में वैराग्य भाव की जागरणा भी हो सकती है तो किसी में किसी दूसरे के प्रति द्वेष का भाव भी उत्पन्न हो सकता है। जन्मों तक संबंधों की परंपरा चल सकती है, चाहे वह मित्रता व प्रेम का हो अथवा शत्रुता का हो, जन्मों तक यह परंपरा चलती रह सकती है। शास्त्र में बताया गया है कि आदमी जो भोग भोगता है, ये विष के समान होते हैं। भोग का कटुक विपाक अर्थात् परिणाम दुःख वाले होते हैं। इसलिए आदमी को भोगों का परित्याग करने का प्रयास करना चाहिए। भोग और योग परस्पर विरोधी हैं। योग अध्यात्म की साधना में सहायक होता है। योग ने मानों कितनी व्यापकता प्राप्त की है कि 21 जून को योग दिवस मनाया जाता है। अध्यात्म की साधना भी योग है।
भोग जगत के कटुक विपाक होते हैं। इसलिए आदमी को भोग को छोड़कर योग की प्रस्थान करने का प्रयास करना चाहिए। साधु अपने जीवनकाल में योग-साधना करते हैं। कई साधु जो बचपन में ही साधु बन गए हैं, वे लम्बेकाल तक योग-साधना कर अपने जीवन का कल्याण करते हैं। जीवन भर भोग के त्यागी बने रहते हैं। साधु जीवन में भोगों से विरक्ति रखने का प्रयास करे और त्याग की चेतना प्रबल रहे। साधु के लिए संयम और साधना का महत्त्व बहुत अधिक होता है। साधु के जीवन में विनय और आचार भी पुष्ट रहे।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं को भी उत्तरित किया। सुश्री जयश्री नाहटा व सुश्री मोक्षा नाहटा ने आचार्यश्री से अठाई की तपस्या का प्रत्याख्यान किया।













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