मध्य-पूर्व में पिछले 107 दिनों से जारी तनाव और सैन्य टकराव के बाद अमेरिका और ईरान एक ऐसे समझौते के करीब पहुंच गए हैं, जिसे क्षेत्रीय राजनीति ही नहीं बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी निर्णायक माना जा रहा है। दोनों देशों के बीच तैयार किए गए 14 सूत्रीय समझौते पर स्विट्जरलैंड के जिनेवा में हस्ताक्षर होने की तैयारी है। इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण पहलू होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलना और आर्थिक प्रतिबंधों से जुड़े विवादों को सुलझाना है।
होर्मुज जलडमरूमध्य विश्व ऊर्जा आपूर्ति की जीवनरेखा माना जाता है। युद्ध और तनाव के कारण इस मार्ग पर उत्पन्न संकट ने वैश्विक तेल बाजारों को झकझोर दिया था। प्रस्तावित समझौते के अनुसार ईरान इस सामरिक समुद्री मार्ग पर लगाए गए सैन्य अवरोध हटाएगा और अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही फिर से सामान्य होगी। इसके बदले अमेरिका ईरानी बंदरगाहों पर लागू अपनी नौसैनिक नाकेबंदी समाप्त करेगा।
समझौते में आर्थिक पहलुओं को भी विशेष महत्व दिया गया है। रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका ईरान की जब्त की गई अरबों डॉलर की संपत्तियों को चरणबद्ध तरीके से जारी करने पर सहमत हुआ है। विभिन्न स्रोतों में यह राशि 12 अरब डॉलर से लेकर 24 अरब डॉलर तक बताई गई है। इस वित्तीय राहत को ईरानी अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
हालांकि यह समझौता युद्धविराम और आर्थिक राहत का रास्ता खोलता है, लेकिन सबसे जटिल मुद्दा अभी भी ईरान का परमाणु कार्यक्रम बना हुआ है। दोनों पक्षों ने इस विषय पर अंतिम निर्णय को आगे की वार्ताओं के लिए सुरक्षित रखा है। प्रस्तावित ढांचे के तहत अगले 60 दिनों के भीतर व्यापक वार्ताएं होंगी, जिनमें परमाणु संवर्धन, यूरेनियम भंडार, प्रतिबंधों में राहत और सुरक्षा गारंटी जैसे विषयों पर चर्चा होगी।
इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाने का दावा किया है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि समझौते का अंतिम मसौदा तैयार हो चुका है और दोनों पक्ष हस्ताक्षर की दिशा में बढ़ रहे हैं। हालांकि समझौते की सफलता का वास्तविक परीक्षण उसके क्रियान्वयन में होगा।
समझौते को लेकर ईरान के भीतर भी मतभेद उभर रहे हैं। कट्टरपंथी धड़े इसे तेहरान की रणनीतिक स्थिति को कमजोर करने वाला कदम बता रहे हैं, जबकि सरकार समर्थक समूह इसे युद्ध और आर्थिक संकट से बाहर निकलने का व्यावहारिक मार्ग मान रहे हैं।
यदि यह समझौता सफलतापूर्वक लागू होता है तो इसके प्रभाव केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेंगे। तेल की कीमतों में स्थिरता, वैश्विक व्यापार मार्गों की सुरक्षा, मध्य-पूर्व में तनाव में कमी और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों में विश्वास की वापसी जैसे व्यापक परिणाम सामने आ सकते हैं। यही कारण है कि इस 14 सूत्रीय समझौते को हाल के वर्षों की सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहलों में से एक माना जा रहा है।













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