डेस्क : देश में थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) आधारित मुद्रास्फीति मई महीने में बढ़कर 9.68 प्रतिशत पर पहुँच गई है। यह जानकारी वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा सोमवार को जारी आंकड़ों में सामने आई। अप्रैल में यह दर 8.26 प्रतिशत थी, जिससे साफ है कि थोक बाजार में महँगाई का दबाव लगातार बढ़ रहा है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस वृद्धि के पीछे मुख्य रूप से खाद्य वस्तुओं, ईंधन और बिजली की कीमतों में बढ़ोतरी जिम्मेदार रही है। इन क्षेत्रों में लागत बढ़ने से समग्र थोक महँगाई पर असर पड़ा है।
आधार वर्ष श्रृंखला में संशोधन
सरकार ने इसी के साथ थोक मूल्य सूचकांक के लिए संशोधित आधार वर्ष श्रृंखला भी लागू की है। यह बदलाव मौजूदा आर्थिक संरचना और उत्पादन पैटर्न को अधिक सटीक रूप से दर्शाने के उद्देश्य से किया गया है।
अधिकारियों के अनुसार नई श्रृंखला से आंकड़ों की गुणवत्ता में सुधार होगा और विभिन्न क्षेत्रों में मूल्य परिवर्तन को अधिक वास्तविक रूप में समझा जा सकेगा।
महँगाई बढ़ने के प्रमुख कारण
विशेषज्ञों के मुताबिक थोक मुद्रास्फीति में तेज़ वृद्धि के पीछे कई कारण हैं:
- कच्चे तेल और ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी
- खाद्य वस्तुओं के दामों में उछाल
- बिजली और ऊर्जा लागत में वृद्धि
- वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में जारी दबाव
इन कारणों ने मिलकर थोक बाजार में कीमतों को व्यापक स्तर पर प्रभावित किया है।
आर्थिक प्रभाव
थोक महँगाई में लगातार वृद्धि का असर आगे चलकर खुदरा बाजार पर भी पड़ सकता है, जिससे आम उपभोक्ताओं पर बोझ बढ़ने की आशंका रहती है। इसके अलावा यह स्थिति रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति के लिए भी चुनौती पैदा कर सकती है, जहाँ महँगाई नियंत्रण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाना आवश्यक होता है।
सरकार द्वारा किया गया आधार वर्ष संशोधन सांख्यिकीय दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन अर्थशास्त्रियों का कहना है कि असली चिंता महँगाई की प्रवृत्ति की दिशा को लेकर है।













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