डेस्क : बिहार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश कुशवाहा को लेकर चल रहे संवैधानिक विवाद के बीच उन्होंने स्पष्ट कहा है कि वह पहले भी मंत्री थे और वर्तमान में भी मंत्री पद पर बने हुए हैं। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब सुप्रीम कोर्ट ने बिना विधायक या विधान पार्षद बने दूसरी बार मंत्री बनाए जाने के मामले में उन्हें, बिहार सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है।
मामले ने बिहार की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। जनहित याचिका में आरोप लगाया गया है कि दीपक प्रकाश संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत निर्धारित छह माह की अवधि के भीतर विधानमंडल के किसी सदन के सदस्य नहीं बन पाए हैं, इसके बावजूद उन्हें दोबारा मंत्री बनाया गया। याचिकाकर्ता ने इसे संवैधानिक प्रावधानों की भावना के विपरीत बताया है।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए दीपक प्रकाश, बिहार सरकार और चुनाव आयोग से जवाब मांगा है। याचिका में वर्ष 2001 के चर्चित ‘एस.आर. चौधरी बनाम पंजाब राज्य’ मामले का हवाला देते हुए कहा गया है कि गैर-विधायक को बार-बार मंत्री बनाकर छह माह की संवैधानिक छूट का विस्तार नहीं किया जा सकता।
इस बीच राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) के प्रमुख एवं राज्यसभा सांसद उपेंद्र कुशवाहा ने अपने पुत्र और मंत्री दीपक प्रकाश का बचाव किया है। इससे पहले एमएलसी चुनाव में उम्मीदवार नहीं बनाए जाने के बाद भी उन्होंने कहा था कि दीपक प्रकाश को एनडीए नेतृत्व ने सोच-समझकर मंत्री बनाया है और जब तक तय किया गया है, वह मंत्री बने रहेंगे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि इस मुद्दे पर एनडीए में किसी प्रकार की नाराजगी नहीं है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद अब बिहार सरकार को अपना पक्ष स्पष्ट करना होगा। मामले की अगली सुनवाई पर सभी की निगाहें टिकी हैं, क्योंकि इसका असर केवल एक मंत्री के पद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि गैर-विधायकों की मंत्री नियुक्ति से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या पर भी पड़ सकता है।













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