डेस्क : हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ गीत ऐसे हैं जो समय की सीमाओं को पार कर अमर हो जाते हैं। फिल्म मेरा नाम जोकर का गीत ‘जीना यहां, मरना यहां’ भी उन्हीं में से एक है। इस कालजयी गीत के रचयिता प्रसिद्ध गीतकार शैलेन्द्र थे, जिन्होंने अपने शब्दों से हिंदी सिनेमा को अनेक अमर गीत दिए, लेकिन स्वयं मात्र 43 वर्ष की आयु में दुनिया को अलविदा कह गए।
शैलेन्द्र का पूरा नाम शंकरदास केसरीलाल शैलेन्द्र था। उनका जन्म 30 अगस्त 1923 को हुआ था। वे हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर के सबसे प्रतिष्ठित गीतकारों में गिने जाते हैं। राज कपूर, मुकेश और संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन के साथ उनकी रचनात्मक साझेदारी ने भारतीय सिनेमा को कई यादगार गीत दिए।
‘आवारा हूं’, ‘मेरा जूता है जापानी’, ‘प्यार हुआ इकरार हुआ’, ‘किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार’, ‘सजन रे झूठ मत बोलो’ और ‘जीना यहां, मरना यहां’ जैसे गीत आज भी श्रोताओं के बीच उतने ही लोकप्रिय हैं जितने अपने दौर में थे। उनकी लेखनी की सबसे बड़ी विशेषता सरल शब्दों में गहरी जीवन-दृष्टि प्रस्तुत करना थी।
बताया जाता है कि शैलेन्द्र की फिल्म तीसरी कसम उनके जीवन का सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट थी। उन्होंने इस फिल्म का निर्माण किया, लेकिन निर्माण में हुई देरी और बॉक्स ऑफिस पर अपेक्षित सफलता न मिलने से उन्हें आर्थिक और मानसिक आघात पहुंचा। इसी तनाव ने उनके स्वास्थ्य को प्रभावित किया।
14 दिसंबर 1966 को शैलेन्द्र का निधन हो गया। उस समय उनकी उम्र केवल 43 वर्ष थी। हालांकि उनका जीवन अपेक्षाकृत छोटा रहा, लेकिन उनके लिखे गीत आज भी भारतीय संगीत प्रेमियों के दिलों में जीवित हैं।
दिलचस्प बात यह है कि ‘जीना यहां, मरना यहां’ गीत का मुखड़ा शैलेन्द्र की मृत्यु के बाद उनके पुत्र शैलि शैलेन्द्र ने पूरा किया था। यह गीत बाद में राज कपूर की फिल्म मेरा नाम जोकर का भावनात्मक प्रतीक बन गया और हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार गीतों में शामिल हो गया।













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