प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बाल विवाह को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि देश में बाल विवाह किसी भी धर्म में मान्य नहीं हो सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि बाल विवाह निषेध कानून सभी धर्मों और समुदायों पर समान रूप से लागू होता है। कोई भी व्यक्तिगत कानून (पर्सनल लॉ) बाल विवाह को वैधता नहीं दे सकता।
न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ ने यह टिप्पणी एक मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें नाबालिग लड़की की शादी रोकने पहुंची पुलिस और चाइल्ड लाइन टीम के काम में बाधा डालने के आरोप में दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की गई थी। अदालत ने आरोपियों के खिलाफ दर्ज मुकदमे को रद्द करने से इनकार कर दिया।
पर्सनल लॉ कानून से ऊपर नहीं: हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने कहा कि बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए बनाया गया कानून है और इसे सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू किया जाएगा। अदालत ने साफ किया कि किसी भी धर्म की परंपरा या व्यक्तिगत कानून के आधार पर नाबालिगों की शादी को मान्यता नहीं दी जा सकती।
कोर्ट ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा और उनके भविष्य को ध्यान में रखते हुए बनाए गए कानून सर्वोपरि हैं। नाबालिगों से जुड़े मामलों में बाल विवाह निषेध अधिनियम और पॉक्सो कानून के प्रावधानों को प्राथमिकता दी जाएगी।
नाबालिग की शादी रोकने गई थी टीम
मामला उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले से जुड़ा है, जहां एक नाबालिग लड़की की शादी कराए जाने की सूचना मिलने के बाद पुलिस और चाइल्ड लाइन की टीम मौके पर पहुंची थी। आरोप है कि वहां मौजूद लोगों ने टीम की कार्रवाई में बाधा पहुंचाई थी। इसके बाद आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस और संबंधित अधिकारियों ने कानून के तहत अपनी जिम्मेदारी निभाई है। अदालत ने मामले की जांच जारी रखने का निर्देश दिया।
बाल अधिकारों की सुरक्षा पर जोर
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि बच्चों की सुरक्षा और उनके अधिकारों की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। किसी भी परिस्थिति में नाबालिगों को ऐसे विवाह में नहीं धकेला जा सकता, जो उनके शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास को प्रभावित करे।













देश
राज्य-शहर
विदेश
बिजनेस
मनोरंजन
जीवंत