नई दिल्ली : भारत की सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस अब देश के रक्षा निर्यात की सबसे बड़ी पहचान बनकर उभर रही है। दुनिया की एकमात्र एक्सपोर्ट की जाने वाली सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल को खरीदने के लिए कई देश भारत के संपर्क में हैं। कुछ वर्ष पहले तक जिस मिसाइल का कोई विदेशी खरीदार नहीं था, आज उसके दो बड़े ग्राहक बन चुके हैं, एक देश के साथ बातचीत अंतिम चरण में है, जबकि कई अन्य देश इसे खरीदने में रुचि दिखा रहे हैं।
फिलीपींस और वियतनाम के बाद अब दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम देश इंडोनेशिया ब्रह्मोस मिसाइल का तीसरा बड़ा ग्राहक बनने जा रहा है। इसके अलावा संयुक्त अरब अमीरात (UAE) भी भारत से ब्रह्मोस खरीदने को लेकर बातचीत कर रहा है।
इंडोनेशिया के साथ 200 मिलियन डॉलर की डील
ब्रह्मोस एयरोस्पेस और इंडोनेशिया के रक्षा मंत्रालय के बीच मंगलवार को एक अहम समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। रक्षा सूत्रों के अनुसार, यह करार करीब 200 मिलियन डॉलर का है। इसके तहत इंडोनेशिया चरणबद्ध तरीके से ब्रह्मोस मिसाइल की दो बैटरियां खरीदेगा।
इस समझौते के बाद औपचारिक खरीद अनुबंध जल्द पूरा होने की उम्मीद है। एक ब्रह्मोस बैटरी में आमतौर पर चार मोबाइल ऑटोनॉमस लॉन्चर, 12 रेडी-टू-फायर मिसाइलें, कमांड पोस्ट, रडार और अन्य सपोर्ट सिस्टम शामिल होते हैं।
फिलीपींस और वियतनाम पहले से ग्राहक
ब्रह्मोस का पहला विदेशी ग्राहक फिलीपींस बना था। वर्ष 2022 में उसने तट आधारित एंटी-शिप मिसाइल बैटरियों के लिए करीब 375 मिलियन डॉलर का समझौता किया था। इसकी डिलीवरी भी पूरी हो चुकी है।
इसके बाद वियतनाम के साथ करीब 629 मिलियन डॉलर की संभावित डील सामने आई। सिंगापुर में आयोजित शांगरी-ला डायलॉग के दौरान भारत के रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने इस संबंध में जानकारी दी थी।
दक्षिण चीन सागर में चीन को चुनौती देने का हथियार
ब्रह्मोस खरीदने वाले तीनों देशों—फिलीपींस, वियतनाम और इंडोनेशिया—का चीन के साथ समुद्री विवाद रहा है। ऐसे में ये देश ब्रह्मोस को अपनी समुद्री सुरक्षा मजबूत करने और चीन की बढ़ती नौसैनिक ताकत का मुकाबला करने के लिए एक प्रभावी रणनीतिक हथियार के रूप में देख रहे हैं।
दक्षिण चीन सागर में चीन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए इन देशों के लिए लंबी दूरी की सुपरसोनिक मिसाइल एक मजबूत प्रतिरोध क्षमता (डिटेरेंस) प्रदान करती है। हालांकि, चीन पहले भी विवादित क्षेत्रों वाले देशों को ऐसी मिसाइलों की बिक्री पर आपत्ति जता चुका है।
ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ी वैश्विक मांग
भारत की ब्रह्मोस मिसाइल की क्षमता को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रुचि उस समय और बढ़ी, जब ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इसके इस्तेमाल ने इसकी सटीक मारक क्षमता को प्रदर्शित किया। इसके बाद कई देशों ने इस मिसाइल प्रणाली में अपनी दिलचस्पी दिखाई।
UAE भी कर रहा भारत से बातचीत
भारत अब संयुक्त अरब अमीरात के साथ ब्रह्मोस मिसाइल और आकाशतीर एयर डिफेंस कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम के निर्यात को लेकर बातचीत कर रहा है। बदलते वैश्विक सुरक्षा समीकरणों के बीच UAE अपनी रक्षा जरूरतों के लिए नए विकल्प तलाश रहा है।
रूस भी ब्रह्मोस में दिखा रहा रुचि
यूक्रेन युद्ध के कारण रूस के मिसाइल भंडार पर दबाव बढ़ा है। ऐसे में खबरें हैं कि रूस अपने नौसैनिक युद्धपोतों के लिए भी ब्रह्मोस मिसाइल को शामिल करने पर विचार कर रहा है।
ब्रह्मोस में रूस की अहम भूमिका
ब्रह्मोस एयरोस्पेस वर्ष 1998 में भारत के डीआरडीओ और रूस की एनपीओ मशीनोस्ट्रोयेनिया के बीच बने संयुक्त उपक्रम के रूप में शुरू हुआ था। इसमें भारत की हिस्सेदारी 50.5 प्रतिशत और रूस की हिस्सेदारी 49.5 प्रतिशत है।
किसी भी तीसरे देश को ब्रह्मोस बेचने के लिए रूस की सहमति जरूरी होती है। दिसंबर 2024 में रूस ने वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे देशों को मिसाइल निर्यात के लिए अपनी सहमति दे दी थी।
290 किलोमीटर तक सीमित है एक्सपोर्ट रेंज
मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम (MTCR) के नियमों के तहत निर्यात की जाने वाली ब्रह्मोस मिसाइल की मारक क्षमता 290 किलोमीटर तक सीमित रखी जाती है। वहीं, भारत अपनी सेनाओं के लिए 450 किलोमीटर से अधिक रेंज वाली ब्रह्मोस मिसाइल विकसित कर चुका है।
यह मिसाइल करीब 2.8 मैक की गति से उड़ान भरती है और इसे जमीन, युद्धपोत, पनडुब्बी और सुखोई-30MKI लड़ाकू विमान से लॉन्च किया जा सकता है।
2029 तक 50 हजार करोड़ रुपये रक्षा निर्यात का लक्ष्य
भारत रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के साथ निर्यात को भी तेजी से आगे बढ़ा रहा है। ब्रह्मोस एयरोस्पेस अगले दो वर्षों में मिसाइल की लागत को करीब 20 प्रतिशत तक कम करने की योजना पर काम कर रहा है।
इसके अलावा हल्की और छोटे प्लेटफॉर्म से लॉन्च की जा सकने वाली ब्रह्मोस-एनजी मिसाइल भी विकसित की जा रही है। भारत ने वर्ष 2029 तक सालाना रक्षा निर्यात को 50 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है, जिसमें ब्रह्मोस मिसाइल की भूमिका बेहद अहम मानी जा रही है।













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