मुंबई: बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी भी बालिग महिला को उसकी इच्छा के खिलाफ न तो घर लौटने के लिए मजबूर किया जा सकता है और न ही उसे दोबारा शादी करने के लिए बाध्य किया जा सकता है। अदालत ने कहा कि वयस्क महिला को अपने जीवन से जुड़े फैसले खुद लेने का पूरा अधिकार है।
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों का हिस्सा है। एक बालिग महिला यह तय करने के लिए स्वतंत्र है कि वह कहां रहना चाहती है, किसके साथ अपना जीवन बिताना चाहती है और अपने भविष्य को लेकर क्या निर्णय लेना चाहती है।
परिवार की इच्छा से ऊपर महिला की स्वतंत्रता
मामला एक 21 वर्षीय युवती से जुड़ा था, जिसने अपने परिवार से अलग रहने का फैसला किया था। युवती ने अदालत में अपनी सुरक्षा और स्वतंत्रता को लेकर याचिका दायर की थी। उसने बताया कि उस पर घर वापस लौटने और अपनी इच्छा के विपरीत शादी करने का दबाव बनाया जा रहा है।
अदालत ने युवती से बातचीत के बाद माना कि वह बालिग है और अपने फैसले लेने में सक्षम है। कोर्ट ने कहा कि केवल परिवार की इच्छा या सामाजिक दबाव के आधार पर किसी वयस्क महिला को उसके फैसले बदलने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
अनुच्छेद-21 के तहत मिला है अधिकार
हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद-21 का हवाला देते हुए कहा कि जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार हर नागरिक को सम्मान के साथ अपनी जिंदगी जीने की आजादी देता है। इसमें व्यक्ति को अपने रहने, शिक्षा, करियर और विवाह जैसे निजी मामलों में निर्णय लेने का अधिकार भी शामिल है।
पुलिस नहीं कर सकती जबरदस्ती
अदालत ने यह भी साफ किया कि पुलिस किसी बालिग महिला को केवल उसके परिवार के दबाव के आधार पर वापस घर भेजने के लिए मजबूर नहीं कर सकती। महिला की इच्छा और उसकी सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
महिला अधिकारों के लिए अहम टिप्पणी
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, बॉम्बे हाईकोर्ट का यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता और महिला अधिकारों को मजबूत करने वाला है। अदालत ने दोहराया है कि बालिग व्यक्ति को अपने जीवन के महत्वपूर्ण फैसले लेने की संवैधानिक आजादी प्राप्त है।













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