लाडनूं : जन-जन के मानस को आध्यात्मिक अभिसिंचन प्रदान करने वाले, जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने बुधवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘भावात्मक ऋजुता और वक्रता’ को उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से विवेचित करते हुए कहा कि एक समय गौतम स्वामी और केशी कुमार श्रमण अपने-अपने शिष्य समुदाय के साथ एक स्थान आमने-सामने विराजमान हुए। दोनों ही शोभायमान हो रहे थे। उनकी उपमा चन्द्र और सूर्य के समान की गई। वहां हजारों लोग भी एकत्रित थे, जहां दो महापुरुषों का मिलन हो रहा था। इसके अलावा वहां अन्य दिव्य शक्तियों की भी उपस्थिति थी।
कुमार श्रमण केशी बात प्रारम्भ करते हुए गौतम स्वामी से कहा कि मेरे परम आराध्य भगवान पार्श्वनाथ की देशना के अनुसार हम लोगों का चातुर्याम धर्म है और आपका पंच शिक्षात्मक पांच महाव्रतों वाला धर्म है, जिसका वर्णन भगवान वर्धमान ने किया है। आप सभी भी मोक्ष की साधना के लिए निकले हैं और हम भी मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। दोनों का साध्य एक है तो फिर धर्म के दो प्रकार कैसे हो गये?
गौतम स्वामी ने कहा कि प्रज्ञा समीक्षा करती है। मूल लक्ष्य तो एक ही है अध्यात्म की साधना, किन्तु प्रज्ञा समीक्षा करती है कि दोनों के आचार क्रिया में थोड़ा अंतर है। भावातमक ऋजुता और वक्रता के कारण दोनों में अंतर हो जाता है। भरतक क्षेत्र में 24 तीर्थंकरों की व्यवस्था है। प्रत्येक अवसर्पिणी काल में और प्रत्येक उत्सर्पिणी काल में 24-24 तीर्थंकर होते हैं। पहले तीर्थंकर के साधु ऋजु जड़ होते हैं और चौबीसवें तीर्थंकर के साधु वक्र जड़ होते हैं। बीच के शेष बाईस तीर्थंकरों के शिष्य ऋजु प्राज्ञ होते हैं।
इस संसार में दो चीजें मुख्य रूप से देखी जाती हैं। पहला स्वभाव कैसा है और दूसरा दिमाग कैसा है। स्वभाव का संबंध मोहनीय कर्म के साथ होता है और दिमाग ज्ञानावरणीय कर्म से संबंधित होता है। प्रथम तीर्थंकर के साधु स्वभाव से भले होते हैं, किन्तु उनका दिमाग व ज्ञान इतना अच्छा नहीं होता। मति को थोड़ा कम माना गया है। उन्हें समझाना कठिन है। उनकी मति जड़वत होती है। वहीं अंतिम तीर्थंकर के साधु वक्र स्वभाव वाले होते हैं। उनका दिमाग वक्रता से युक्त होता है। वे नियमों में गली निकालने वाले होते हैं। तर्क देने के कारण वे मान्य बातों में भी गली निकाल लेते हैं। बीच के शेष बाईस तीर्थंकरों के साधु सरल और समझदार दोनों ही होते हैं। उनकी मति भी अच्छी और वे बहुत भले भी होते हैं।
जो साधु ऋजु प्राज्ञ हैं, उनके लिए चार नियम ही काफी होते हैं और जो साधु वक्र जड़ वाले साधुओं के लिए पांच महाव्रत आवश्यक होते हैं। ऋजुता, वक्रता और जड़ता ये तीन स्थितियां बन जाती हैं। मोहनीय कर्म हल्का हो, कषाय की मंदता हो तो भावात्मक ऋजुता आ सकती है। इसमें प्रेरणा लेने वाली बात है कि साधु के पास ज्ञान भी अच्छा हो, साधु की मति भी अच्छी हो और साधु में ऋजुता का भी विकास हो। इसके लिए साधु को अपने भीतर सरलता का भाव रखने का प्रयास होना चाहिए। छल-कपट से बचने का प्रयास करना चाहिए। अनावश्यक तर्क आदि के माध्यम से रास्ता निकालने से बचने का प्रयास करना चाहिए। ऋजुता की भावना साधु में रहनी चाहिए।
आदमी भी सरल और भद्र रहे, ऐसा प्रयास होना चाहिए। भद्रता का विकास हो, ऐसा प्रयास करना चाहिए। अच्छा ज्ञान, अच्छी श्रद्धा, सरलता हो तो झूठ-कपट से बचा जा सकता है। मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं के उत्तर भी प्रदान किए।













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