लाडनूं : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने गुरुवार को सुधर्मा सभा में समायोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘वेश और साधुता’ को आगम के माध्यम से विवेचित करते हुए कहा कि वेश और साधुता दो अलग-अलग चीज हैं। जैन धर्म के एक अचेलक परंपरा चल रही है और एक ओर उत्तरीय धारण करते हैं। हालांकि दोनों का लक्ष्य एक ही है, फिर भी भेद क्यों? उत्तर प्रदान किया गया कि पहचान एक साधन वेश होता है। आज तेरापंथ धर्मसंघ के साधुओं को देखें तो उनकी मुखवस्त्रिका थोड़ी लम्बी ज्यादा और कम चौड़ाई वाली है, जो वर्तमान में तेरापंथ की पहचान बनी हुई है। हालांकि यह वेश है, इसमें साधुपन नहीं होता। केवल ज्ञान बिना मुखवस्त्रिका वालों को भी हो सकता है। मोक्ष बिना मुखवस्त्रिका वाले भी जा सकते हैं। साधुता, मुखवस्त्रिका, रजोहरण आदि में नहीं होता।
साधुता व्यक्ति के भीतर रहने वाली है, किन्तु दुनिया में पहचान वेश से ही होती है। वेश एक प्रकार की व्यवस्था है, पहचान के अनुसार ही चलने का प्रयास करना चाहिए। वेश को रखने के तीन कारण बताए गए हैं। पहला बताया गया कि लोगों की पहचान के लिए। लोगों को कैसे पता चल सकता है कि कौन साधु है और कौन सामान्य व्यक्ति? जब साधु का वेश आ जाता है तो पहचान मिल जाती है, यह उसकी उपयोगिता है। चारों आम्नाय के संत बैठें हों, किन्तु वस्त्र, मुखवस्त्रिका आदि के माध्यम से सबकी अलग-अलग पहचान हो सकती है। वेश से पहचान हो जाती है। लोक में परिचय के लिए, पहचान के लिए वेश की व्यवस्था की गई है।
दूसरी बात बताई गई कि जीवन को चलाने में वेश सहायक बनता है। कहीं सर्दी का मौसम हो तो गर्म कपड़े पहन लेने से उसका सर्दी से बचाव हो जाता है। हालांकि आगम में अचेलता को भी प्रशस्त बताया गया है। अचेलता भी एक पहचान की बात हो सकती है। जीवन यात्रा में वेश सहायक बनते हैं।
तीसरी बात बताई गई कि वेश से साधु को यह ध्यान कराता रहता है कि वह साधु है, उसे कोई गलत कार्य नहीं करना। गृहस्थों से हटकर साधु का वेश होता है तो वह उसे यह भान कराते रहते हैं कि वह साधु है, उसे किसी प्रकार से गलत कार्य से बचने का प्रयास होना चाहिए।
इन कारणों को देखते हुए वेश की अवधारणा की गई है। साधुता तो बिल्कुल अलग बात होती है। साधुता के लिए वेश आत्यांतिक आवश्यक नहीं है। व्यवहार नय में वेश की अपेक्षा होती है, निश्चय नय में साधुता के लिए वेश की अनिवार्य नहीं है। वेश व्यवहार की बात है। ज्ञान, दर्शन और चारित्र साधुता है। इसके बिना मोक्ष की प्राप्ति संभव नहीं। वर्तमान समय में अपने-अपने आम्नाय की जो वेशभूषा है, उसका ध्यान रखने का प्रयास करना चाहिए।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं को उत्तरित किया।













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