लाडनूं :जन-जन के मानस को अभिसिंचन प्रदान करने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने सोमवार को प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘एषण समिति: स्वरूप और विधि’ को आगम के माध्यम से व्याख्यायित करते हुए कहा कि साधु के पांच महाव्रत होते हैं। फिर पांच समितियां और तीन गुप्तियां भी होती हैं। पांच समितियों में तीसरी समिति है-एषणा समिति। यह भोजन आदि से जुड़ी हुई है।
जीवन को चलाने के लिए जल भी चाहिए, भोजन भी चाहिए और हवा भी चाहिए। हवा इनमें से सबसे ज्यादा आवश्यक होती है। हवा, जल और भोजन- ये तीनों मानव जीवन की प्रथम कोटि की आवश्यकता होती है। इनमें हवा को प्रथम स्थान, जल को दूसरा और भोजन को तीसरा स्थान दिया गया है। भोजन के बिना तो कई दिन बिताए जा सकते हैं। लम्बी-लम्बी तपस्याएं करने वाले लोग कितने-कितने दिन बिना भोजन के निकाल देते हैं, लेकिन वही पानी के बिना लम्बे समय तक निकालना कठिन होता है। आदमी पानी पीकर कई दिन निकाल सकता है। वहीं अगर हवा की बात की जाए तो हवा के बिना तो आदमी को कितना दिन निकाल सकता है? हवा के बिना दिन तो क्या आदमी कुछ घड़ी भी पूरी तरह नहीं बीता सकता है। इसलिए हवा अति आवश्यक होती है।
साधु को भी जीवन जीना होता है। औदारिक शरीर वाला है तो इस शरीर की मांग भी होती है। भूख लगती है तो भोजन की अपेक्षा, प्यास लगे तो पानी की आवश्यकता होती है। अन्य शारीरिक कार्यों के लिए भी पानी की आवश्यकता होती है। इसके साथ-साथ साधु को तन ढकने के लिए वस्त्र आदि की आवश्यकता भी होती है। वर्तमान हम कपड़ा पहनने वालों की परंपरा में हैं। इसलिए साधु को कपड़ा भी चाहिए। रहने के लिए स्थान और मकान भी चाहिए। कभी दवाई आदि की आवश्यकता भी पड़ती है, पड़ सकती है। इसके लिए साधु को एषणा समिति की विधि मिली हुई है। साधु को स्वाद के लिए किसी तरह का इशारा करने से बचने का प्रयास होना चाहिए। इस कारण चारित्रात्माओं को इशारे से कुछ मांगने की आदि से बचने का प्रयास करना चाहिए। साधु को समता-शांति रखने का प्रयास करना चाहिए। गोचरी में जो मिल जाए, उसे ही समता से ग्रहण करना चाहिए। साधु को अधिक खाने-पीने से बचने का प्रयास होना चाहिए। साधु को एषणा समिति के प्रति जागरूक रहे, ऐसा प्रयास होना चाहिए।
साधु केवल भोजन का ही अल्पीकरण न करे, अपने अनेक कार्यों में सकर्तकता और जागरूकता रखने का प्रयास होना चाहिए। साधु को अल्पीकरण होना चाहिए। अनावश्यक वस्तुओं के संग्रह से भी बचने का प्रयास होना चाहिए। साधु को कोई चीज स्वीकार करने से पहले साधु को पूछताछ भी कर लेने का प्रयास होना चाहिए।
मंगल प्रवचन के दौरान आचार्यश्री ने चतुर्दशी के संदर्भ में हाजरी का वाचन करते हुए चारित्रात्माओं को विविध प्रेरणाएं प्रदान की। आचार्यश्री की अनुज्ञा से साध्वी चन्दनप्रभाजी व साध्वी पद्मप्रभाजी ने लेखपत्र का उच्चारण किया। आचार्यश्री ने साध्वी चन्दनप्रभाजी को 21 कल्याणक व साध्वी पद्मप्रभाजी को पांच कल्याणक बक्सीस किए। आचार्यश्री ने साध्वी पद्मप्रभाजी से दसवेआलियं के कुछ श्लोक सुनाने को कहा तो साध्वीजी ने उन श्लोकों का उच्चारण किया तो आचार्यश्री ने उन्हें पुनः पांच कल्याणक बक्सीस प्रदान किए। तदुपरान्त उपस्थित चारित्रात्माओं ने अपने स्थान पर खड़े होकर लेखपत्र का उच्चारण किया।













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