मैं कोई पत्रकार नहीं, कोई लेखक नहीं, न ही कोई विचारक।
मैं तो बस एक आम भारतीय पिता हूँ — जिसकी सुबह अख़बार पढ़ते हुए होती है और रात बेटियों की सलामती की दुआ करते हुए।
और शायद यही वजह है कि जब मैं सौम्यश्री मिश्री की जलकर मरने की खबर पढ़ता हूँ, तो मेरा कलेजा कांप जाता है। मुझे डर लगता है।
क्योंकि मेरे घर में भी बेटियाँ हैं।
एक बेटी जो अकेली जली — और देश चुप रहा
उड़ीसा के बालासोर की बीएड छात्रा सौम्यश्री मिश्री ने आत्मदाह कर लिया।
शब्दों में कह देना आसान है — “आत्मदाह कर लिया” —
लेकिन सोचिए, किस हद तक टूटी होगी वो बेटी, जिसने खुद को आग में झोंकना चुना?
उसका अपराध सिर्फ इतना था कि उसने अपने शिक्षक की गंदी मांगों के आगे झुकने से इनकार कर दिया।
उसने कहा, “नंबर चाहिए, इज्जत नहीं दूंगी।”
उसने कहा, “मैं पढ़ने आई हूँ, बिकने नहीं।”
और यह कहने की सज़ा उसे तिल-तिल कर जलने में मिली।
वो अकेली नहीं लड़ी… लेकिन अकेली मर गई
सौम्यश्री ने शिकायत की। प्रिंसिपल को बताया। लिखित शिकायत दी। सोशल मीडिया पर न्याय की अपील की।
उसने हिम्मत दिखाई। बार-बार दिखाई।
लेकिन क्या हुआ?
कुछ नहीं हुआ।
कोई कार्रवाई नहीं हुई।
कोई जांच नहीं हुई।
कोई टीवी चैनल नहीं गया।
किसी पत्रकार को टीआरपी नहीं दिखी।
और फिर…
12 जुलाई को, अपने ही कॉलेज के प्रिंसिपल ऑफिस के सामने उसने खुद पर पेट्रोल डाला और आग लगा ली।
14 जुलाई को रात 11:30 बजे — वो बेटी हमेशा के लिए खामोश हो गई।
मैं समझता हूँ… क्योंकि मेरे घर में भी बेटियाँ हैं
जब मेरी बेटी स्कूल जाती है, तो मैं घड़ी देखता हूँ।
अगर वो समय से न लौटे, मोबाइल बंद हो, तो मेरी धड़कनें रुक जाती हैं।
क्यों?
क्योंकि सौम्यश्री जैसे किस्से अब अपवाद नहीं रहे।
अब ये खबरें नहीं हैं — ये हमारी रोज़ की आशंका हैं।
मैं डरता हूँ कि कहीं मेरी बेटी भी कल किसी समीर साहू का निशाना न बन जाए।
कहीं वो भी सिस्टम से लड़ते-लड़ते अकेली न पड़ जाए।
कहीं कोई उसकी आवाज़ न सुने — और फिर वो भी…
नहीं, मैं यह सोचते हुए कांप जाता हूँ।
मुझे शर्म भी आती है… और गुस्सा भी
एक अभिनेत्री का कपड़ा फट जाए तो चैनल की ब्रेकिंग न्यूज बन जाती है।
कोई अभिनेता घायल हो जाए तो 48 घंटे विशेष कवरेज चलता है।
लेकिन एक 20 साल की लड़की, जो शिक्षक बनने निकली थी,
जब शिक्षा के मंदिर में ही ज़िंदा जला दी जाती है,
तो यह देश इतना चुप क्यों हो जाता है?
क्या हमारी संवेदनाएं अब टीआरपी से तय होंगी?
क्या बेटियों की चीखें अब खबर तभी बनेंगी जब वे राख बन जाएँ?
कब जागोगे? जब अपनी बेटी की बारी आएगी?
मैं पूछता हूँ —
क्या सौम्यश्री को हम यूँ ही भुला देंगे?
क्या अगली सौम्यश्री के लिए भी इंतजार करेंगे कि वो खुद को आग लगा ले?
अंत में… सिर्फ एक बात कहनी है
मैं सौम्यश्री को नहीं जानता।
उसके पिता से भी कभी नहीं मिला।
लेकिन जब वो बेटी जली,
मुझे ऐसा लगा — जैसे मेरे घर की रौशनी बुझ गई हो।
मैं समझता हूँ…
क्योंकि मेरे घर में भी बेटियाँ हैं।













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