डेस्क: मिडिल ईस्ट में जारी तनाव अब भारतीय रसोई तक पहुँचने लगा है। इस बार मामला सिर्फ एलपीजी तक सीमित नहीं है, बल्कि किचन की सबसे जरूरी चीज—खाने का तेल—भी महंगी हो रही है। भारत में पूड़ी, पराठा, समोसा, जलेबी से लेकर रोजमर्रा की सब्जियों तक, हर चीज में तेल का इस्तेमाल होता है। ऐसे में तेल की कीमतों में बढ़ोतरी सीधे आम आदमी की जेब पर असर डाल रही है।
क्या है स्थिति:
पिछले एक महीने में खाने के तेल की कीमतों में साफ उछाल देखने को मिला है। 24 फरवरी से 24 मार्च 2026 के बीच सूरजमुखी तेल की कीमत 175 रुपये से बढ़कर 181 रुपये प्रति किलो हो गई। पाम ऑयल 5 रुपये महंगा होकर 141 रुपये प्रति किलो पहुंच गया। सोयाबीन तेल में 4 रुपये प्रति किलो की बढ़ोतरी हुई, जबकि मूंगफली, वनस्पति और सरसों तेल की कीमतों में लगभग 3 रुपये प्रति किलो का इजाफा हुआ है।
खाने का तेल सिर्फ स्वाद बढ़ाने का जरिया नहीं है, बल्कि यह पोषण का भी अहम स्रोत है। तेल शरीर को जरूरी फैट, ऊर्जा और विटामिन देता है, खासकर उन लोगों के लिए जो कुपोषण का सामना कर रहे हैं।
मांग बनाम उत्पादन:
देश में तेल की मांग तेजी से बढ़ रही है, जबकि घरेलू उत्पादन उतनी गति से नहीं बढ़ पा रहा है। 2022-23 में शहरी भारत में एक व्यक्ति औसतन 12 किलो और ग्रामीण इलाकों में करीब 11 किलो तेल सालाना इस्तेमाल करता है। 2004-05 की तुलना में यह खपत काफी बढ़ गई है।
बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए भारत करीब 56 फीसदी तेल आयात करता है, जबकि केवल 44 फीसदी घरेलू उत्पादन से आता है। आयात के आंकड़े भी इस निर्भरता को दिखाते हैं। 2017 में भारत ने 11.8 अरब डॉलर का तेल आयात किया था, जो 2022 में बढ़कर 21.1 अरब डॉलर हो गया। 2025 में यह थोड़ा घटकर 18.6 अरब डॉलर रहा। इसमें पाम ऑयल की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा 41%, सोयाबीन तेल 35% और सूरजमुखी तेल 18% रही।
सरकार का कहना:
सरकार का दावा है कि ईरान से जुड़े मौजूदा तनाव के बावजूद भारत में तेल की सप्लाई पर बड़ा खतरा नहीं है। भारत मलेशिया, इंडोनेशिया और अमेरिका जैसे कई देशों से तेल आयात करता है, जिससे किसी एक देश से सप्लाई प्रभावित होने पर विकल्प मौजूद रहते हैं।
इसके साथ ही, सरकार ने आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए ‘नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल्स-ऑयलसीड्स’ शुरू किया है, जिसका उद्देश्य आने वाले वर्षों में देश में तेल उत्पादन बढ़ाना है।













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