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अनित्य की अनुप्रेक्षा कर मोह-मूर्च्छा से बचने का हो प्रयास : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण

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Home आराधना-साधना

अनित्य की अनुप्रेक्षा कर मोह-मूर्च्छा से बचने का हो प्रयास : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण

‘परभव में कौन जाता है?’ विषय को आचार्यश्री ने किया व्याख्यायित 

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June 6, 2026
in आराधना-साधना
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अनित्य की अनुप्रेक्षा कर मोह-मूर्च्छा से बचने का हो प्रयास : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण
लाडनूं : जन-जन के मानस को आध्यात्मिक सिंचन प्रदान करने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने शनिवार को प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम के दौरान उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘परभव में कौन जाता है?’ के माध्यम से पावन संबोध प्रदान करते हुए कहा कि शास्त्रों में 12 भावनाएं उपलब्ध होती हैं। शांत सुधारस ग्रंथ में 16 भावनाएं बताई गई हैं। इसके कंठस्थीकरण, अर्थबोध व स्वाध्याय से पवित्र आनंद की अनुभूति होती है। इन सभी भावनाओं में सबसे पहली अनित्य अनुप्रेक्षा है। जिसका प्रयोग प्रेक्षाध्यान पद्धति में भी बहुत प्रमुखता से किया जाता है। इसके माध्यम से आदमी को यह ध्यान देना चाहिए कि यह जीवन अनित्य है। यहां कोई आदमी स्थाई नहीं है। अनित्यता की जानकारी देने वाली अनेक बातें, दोहे, श्लोक आदि प्राप्त होते हैं। इनके माध्यम से आदमी के भीतर अनित्यता का बोध उजागर होता है तो मोह-मूर्च्छा व आसक्ति में कमी भी आ सकती है।
आदमी को मोह-मूर्च्छा से बचने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को एक दिन सब कुछ यही छोड़कर अवश्य जाना है। यह जीवलोक पूरी तरह अनित्य है, इसलिए आदमी को आसक्ति और मोह से बचने का प्रयास करना चाहिए। दुनिया में दो चीजें हैं-एक धु्रव और दूसरा है अधु्रव। आत्मा, परमात्मा और अहिंसा रूपी धर्म ही धु्रव हैं, जबकि धन-संपत्ति, सांसारिक संयोग और रिश्ते-नाते अधु्रव हैं। जो इंसान अधु्रव के पीछे भागता है, वह अपने धु्रव अर्थात् धर्म और आत्मा को नष्ट कर सकता है। शरीर और वैभव कभी स्थाई नहीं रहने वाले। मृत्यु लगातार निकट आ रही है, इसलिए आदमी को हर पल धर्म का संचय करने का प्रयास करना चाहिए।
प्रतिदिन सूर्य उदय और अस्त होता है, वह केवल आता-जाता नहीं है, बल्कि व्यावहारिक रूप में हमारे जीवन की अवधि का एक-एक दिन अपने साथ लेकर चला जाता है। जन्मदिन आने पर लोग बहुत खुशियां मनाते हैं, किन्तु आदमी के पूर्ण आयुष्य में से एक साल आज कम हो जाता है। इस बात को समझकर आदमी को जागरूक और सावधान हो जाना चाहिए।
आचार्यश्री ने आगे कहा कि राजनीति कोई बुरी चीज नहीं है, यह जनता की सेवा का बहुत बड़ा साधन है, क्योंकि इसके बिना राष्ट्र का संचालन कठिन हो जाएगा। राजनीति में रहने वाले व्यक्ति को जानकार, सिद्धांतवादी, ईमानदार और सेवाभावी होना चाहिए। आदमी को यह ध्यान देना चाहिए कि सत्ता केवल सेवा के लिए है, भोग-विलास के लिए नहीं। आदमी कोई भी कार्य करे, उसे आसक्ति से मुक्त रहने का प्रयास करना चाहिए। उसके प्रति कोई मोह, मूर्च्छा से बचने का प्रयास करना चाहिए।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं को अपनी जिज्ञासाओं को प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया तो अनेक चारित्रात्माओं अपनी जिज्ञासाओं को आचार्यश्री के सम्मुख प्रस्तुत किया, जिसे आचार्यश्री ने उत्तरित किया।
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