नई दिल्ली : भारत के बैंकिंग क्षेत्र को निकट भविष्य में ऋण वृद्धि के लिए “व्यापक रूप से सकारात्मक दृष्टिकोण” प्राप्त है। यह धारणा बेहतर परिसंपत्ति गुणवत्ता, मजबूत पूंजी आधार, सशक्त खुदरा एवं लघु-मध्यम उद्यम ऋण (एमएसएमई) और निजी पूंजी निवेश में पुनरुद्धार के शुरुआती संकेतों पर आधारित है। यह जानकारी एक सर्वेक्षण में सामने आई है।
भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (फिक्की) और भारतीय बैंक संघ (आईबीए) द्वारा आयोजित बैंकर्स सर्वेक्षण का 21वां दौर जनवरी–फरवरी 2026 में किया गया। इसमें जनवरी से जून 2026 की अवधि के लिए बैंकिंग क्षेत्र की भावनाओं और संभावनाओं का आकलन किया गया। इस सर्वेक्षण में सार्वजनिक, निजी, विदेशी, लघु वित्त और सहकारी बैंकों सहित कुल 24 बैंकों ने भाग लिया।
सर्वेक्षण के अनुसार, बैंकों को उम्मीद है कि मौद्रिक नीति की वर्तमान स्थिति आगामी महीनों में लगभग स्थिर बनी रहेगी। बैंक इसे विकास और मुद्रास्फीति के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए उपयुक्त मानते हैं। गैर-खाद्य ऋण की गति भी जारी रहने की संभावना जताई गई है।
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक विशेष रूप से आशावादी नजर आए हैं। इसका कारण बेहतर परिसंपत्ति गुणवत्ता, मजबूत पूंजी स्थिति और कॉर्पोरेट ऋण में बढ़ती सक्रियता बताया गया है। वहीं निजी बैंक संतुलित और चयनात्मक दृष्टिकोण अपना रहे हैं, जबकि विदेशी बैंक अपने सीमित कॉर्पोरेट और संस्थागत एक्सपोजर के अनुरूप मध्यम आशावाद दिखा रहे हैं।
क्षेत्रवार दृष्टि से सेवा क्षेत्र और खुदरा ऋण बैंकिंग वृद्धि के प्रमुख चालक बने रहने की संभावना है। सेवा क्षेत्र में रियल एस्टेट, वित्तीय सेवाएं, लॉजिस्टिक्स और पर्यटन से जुड़ी गतिविधियों के कारण विस्तार की मजबूत उम्मीदें हैं। खुदरा ऋण भी मजबूत बने रहने का अनुमान है, जो बैंकिंग विकास का एक प्रमुख आधार बना रहेगा।
लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) की ऋण मांग को विशेष रूप से मजबूत बताया गया है। इसका कारण छोटे व्यवसायों में बढ़ती गतिविधि, औपचारिकीकरण में वृद्धि और नीतिगत समर्थन है।
हालांकि औद्योगिक ऋण वृद्धि अपेक्षाकृत धीमी गति से आगे बढ़ने की संभावना है, जो क्रमिक सुधार का संकेत देती है। सावधि ऋण की मांग मुख्य रूप से अवसंरचना, रियल एस्टेट, ऑटो और ऑटो कंपोनेंट्स, फार्मा तथा डेटा सेंटर और रक्षा जैसे उभरते क्षेत्रों से आने की उम्मीद है।
कार्यशील पूंजी की मांग व्यापार और संचालन चक्रों से जुड़ी रहेगी। इसमें कपड़ा, ऑटोमोबाइल, फार्मा, इंजीनियरिंग वस्तुएं और खाद्य प्रसंस्करण जैसे क्षेत्र प्रमुख रहेंगे, जबकि सेवा क्षेत्र में थोक एवं खुदरा व्यापार, परिवहन, पर्यटन और आतिथ्य उद्योग मांग को आगे बढ़ाएंगे।
सर्वेक्षण में यह भी कहा गया है कि बैंकिंग क्षेत्र में संरचनात्मक बदलाव तेजी से हो रहे हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता को सबसे अधिक विघटनकारी तकनीक माना गया है, जो ऋण मूल्यांकन, जोखिम आकलन और वसूली प्रक्रियाओं को बदलने की क्षमता रखती है। फिनटेक और बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा और सहयोग भी बैंकिंग मॉडल को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण कारक बन रहे हैं।
रणनीतिक स्तर पर बैंक आगामी वर्ष के लिए जलवायु जोखिम प्रबंधन और वित्तीय समावेशन पर अधिक ध्यान दे रहे हैं। इसके साथ ही ऋण वृद्धि, परिसंपत्ति गुणवत्ता और डिजिटल परिवर्तन जैसे पारंपरिक लक्ष्य भी प्राथमिकता में बने हुए हैं।
सर्वेक्षण में यह भी रेखांकित किया गया है कि सतत वित्त के अवसर तेजी से बढ़ रहे हैं, जिनमें नवीकरणीय ऊर्जा वित्तपोषण को सबसे अधिक संभावनाशील क्षेत्र माना गया है।
जोखिमों के संदर्भ में साइबर सुरक्षा को वर्तमान समय की सबसे गंभीर चुनौती बताया गया है, जो तेज डिजिटलकरण और तकनीकी ढांचे को मजबूत करने की आवश्यकता को दर्शाता है।













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