भारत दुनिया का सबसे बड़ा आम उत्पादक देश है। मौजूदा वक्त में चीन भी दुनिया के सबसे बड़े आम उत्पादक देशों में से है। लेकिन क्या आपको पता है कि 1960 के दशक तक चीनी लोगों के लिए आम करीब-करीब अज्ञात था। आम के साथ भारत की चीन को लेकर कूटनीति जानते हैं आप? आइए जानने की कोशिश करते हैं कि भारत ने 1950 के दशक में आम से कूटनीति की शुरुआत कैसे की।
प्रस्ताव आते ही क्यों टल गया?
शुरुआती योजना के मुताबिक आम के पौधों को 1954 की सर्दियों में गुआंगझोउ के पीपल्स पार्क में रोपण के लिए भेजा जाना था। हालांकि बीजिंग स्थित भारतीय दूतावास ने विदेश मंत्रालय को सलाह दी कि यह मौसम चीन में आम के पौधे लगाने का उपयुक्त समय नहीं है। ऐसे में इस प्रस्ताव को कुछ दिनों के लिए टाल दिया गया।
1955 में फिर से योजना पर शुरू किया गया काम
दी प्रिंट की एक रिपोर्ट बताती है कि मई 1955 में फिर से योजना पर काम शुरू किया गया। बीजिंग दूतावास ने विदेश मंत्रालय ने आम के पौधों की जल्द से जल्द व्यवस्था करने के लिए कहा। तैयारी शुरू हुई और फाइनल हुआ कि पौधों को एक सांस्कृतिक प्रतिनिधिमंडल के साथ चीन भेजा जाएगा। शुरू में तय किया गया कि 11 पौधे चीन भेज जाएंगे फिर इसे 8 कर दिया गया। 30 मई को विदेश मंत्रालय ने बीजिंग स्थित भारतीय दूतावास को बताया कि 8 आम के नमूने वाले दो क्रेट 5 जून को होन्ग-कोन्ग भेजे जा रहे हैं।
भारत ने आम भेजे लेकिन क्या वे पहुंचे?
इसके बाद बीजिंग दूतावास ने कहा कि हम चीनी पक्ष को जानकारी दे रहे हैं लेकिन पौंधों की संख्या बढ़ाई जाए क्योंकि 8 को बहुत कम माना जाएगा। आखिरकार पौधों की गुणवत्ता आदि देखने के बाद विदेश मंत्रालय ने 3 दशहरी, 2 चौसा, 2 अल्फांजो और 1 लंगड़ा आम को भेजने की स्वीकृति दे दी। लेकिन इसके बाद की जानकारी पब्लिक रिकॉर्ड में नहीं हैं।
50 साल लग गए दोबारा फल चीन भेजने में…
आम के पौधे चीन भेजे जाने के कुछ सालों बाद 1962 में दोनों देशों के बीच युद्ध हुआ उर रिश्ते की मिठास खटास में बदल गई। रिपोर्ट्स बताती हैं कि इसके बाद भारत को चीन आम भेजने में करीब 50 सालों का वक्त लग गया। पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी की 2003 की चीन यात्रा के दौरान दोनों देशों ने डब्ल्यूटीओ द्विपक्षीय समझौते के तहत एक समझौते पर हस्ताक्षर किए जाने के बाद 2004 में एम्ब्रोसियन फल के साथ भारत से पहली आधिकारिक खेप चीन में उतरी।













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