नई दिल्ली: भारत की समुद्री रक्षा क्षमता को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि प्राप्त हुई है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन ने पनडुब्बियों के लिए स्वदेशी वायु-स्वतंत्र प्रणोदन प्रणाली विकसित कर ली है, जो अब अंतिम चरण में पहुंच चुकी है।
यह अत्याधुनिक तकनीक भारतीय नौसेना की पारंपरिक डीजल-विद्युत पनडुब्बियों को बिना सतह पर आए लंबे समय तक जल के भीतर रहने में सक्षम बनाएगी। इससे उनकी गोपनीयता क्षमता और युद्धक दक्षता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।
वर्तमान में पारंपरिक पनडुब्बियों को बैटरी चार्ज करने के लिए समय-समय पर सतह के निकट आना पड़ता है, जिससे उनके पता चलने का खतरा बना रहता है। नई वायु-स्वतंत्र प्रणोदन प्रणाली इस आवश्यकता को काफी हद तक समाप्त कर देगी, जिससे पनडुब्बियों की सुरक्षा और संचालन क्षमता में बड़ा सुधार होगा।
यह प्रणाली फॉस्फोरिक अम्ल ईंधन कोशिका तकनीक पर आधारित है, जिसमें हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की रासायनिक प्रतिक्रिया से ऊर्जा उत्पन्न होती है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसका अत्यंत कम ध्वनि स्तर है, जिससे पनडुब्बियों का पता लगाना और भी कठिन हो जाता है।
सूत्रों के अनुसार, इस स्वदेशी प्रणाली को भारतीय नौसेना की स्कॉर्पीन श्रेणी की पनडुब्बियों में चरणबद्ध तरीके से लगाया जाएगा। सबसे पहले इसे आईएनएस खंडेरी में स्थापित किए जाने की संभावना है, जिसके बाद समुद्री परीक्षण किए जाएंगे।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस तकनीक के सफल उपयोग के बाद भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो जाएगा जिनके पास स्वदेशी वायु-स्वतंत्र प्रणोदन क्षमता है। यह उपलब्धि न केवल देश की समुद्री शक्ति को मजबूत करेगी, बल्कि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को भी नई दिशा प्रदान करेगी।













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