डेस्क : हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर में कई ऐसे गीत बने जिन्होंने श्रोताओं के दिलों में स्थायी स्थान बनाया, लेकिन कुछ गीत ऐसे भी रहे जिनके अर्थ को लेकर विवाद खड़े हो गए। ऐसा ही एक रोचक प्रसंग प्रसिद्ध गायिका आशा भोंसले से जुड़ा है, जब उन्हें अपने एक लोकप्रिय गीत के अर्थ को स्पष्ट करने के लिए आकाशवाणी पर आकर श्रोताओं को सफाई देनी पड़ी थी।
यह मामला फिल्म ‘लेकिन…’ के चर्चित गीत ‘झूठे नैना बोले सांची बतियां’ से जुड़ा था। इस गीत को आशा भोंसले और पंडित सत्यशील देशपांडे ने स्वर दिया था। इसके बोल प्रसिद्ध गीतकार गुलजार ने लिखे थे, जबकि संगीत हृदयनाथ मंगेशकर ने तैयार किया था।
गीत में प्रयुक्त कुछ पारंपरिक और लोकभाषा से जुड़े शब्द आम श्रोताओं के लिए सहज नहीं थे। परिणामस्वरूप गीत के बोलों को लेकर अलग-अलग तरह की व्याख्याएं होने लगीं। उस समय श्रोताओं के बीच भ्रम इतना बढ़ गया कि आशा भोंसले को आकाशवाणी के एक कार्यक्रम में आकर गीत के वास्तविक भाव और अर्थ को समझाना पड़ा।
बताया जाता है कि गीत में प्रेम, उलाहना और लोकगीतों की पारंपरिक शैली का सुंदर प्रयोग किया गया था। हालांकि कई श्रोताओं ने इसके शब्दों को अलग-अलग संदर्भों में समझा, जिससे गीत चर्चा का विषय बन गया। बाद में आशा भोंसले ने स्पष्ट किया कि गीत का आशय लोक परंपरा में प्रचलित प्रेम संवाद और भावनात्मक नोकझोंक से जुड़ा है, न कि उन अर्थों से जो कुछ लोग निकाल रहे थे।
संगीत जगत के जानकारों का मानना है कि यह घटना इस बात का उदाहरण है कि भारतीय फिल्म संगीत में लोकभाषाओं और काव्यात्मक अभिव्यक्तियों का कितना गहरा प्रभाव रहा है। कई बार गीतों के शब्द इतने साहित्यिक और सांकेतिक होते हैं कि उनके वास्तविक अर्थ को समझने के लिए अतिरिक्त व्याख्या की आवश्यकता पड़ जाती है।
आज भी ‘झूठे नैना बोले सांची बतियां’ हिंदी सिनेमा के उन चुनिंदा गीतों में गिना जाता है, जिनमें शास्त्रीय संगीत, लोक परंपरा और काव्य सौंदर्य का अद्भुत संगम दिखाई देता है।













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