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Home आराधना-साधना

इंद्रिय विषयों के अनावश्यक उपभोग से बचे : आचार्यश्री महाश्रमण

मोहनीय कर्म बंधन के तत्वों को गुरूदेव ने किया व्याख्यायित

ON THE DOT TEAM by ON THE DOT TEAM
April 24, 2026
in आराधना-साधना
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इंद्रिय विषयों के अनावश्यक उपभोग से बचे : आचार्यश्री महाश्रमण

लाडनूं : जैन विश्व भारती, लाडनूं का पावन परिसर इन दिनों अप्रतिम आध्यात्मिक उल्लास और भक्ति के सागर में गोते लगा रहा है। कल दिनांक 25 अप्रैल को अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी का 65वां पावन जन्मोत्सव एवं 26 अप्रैल को उनका 17वां आचार्य पट्टोत्सव (पदारोहण दिवस) भव्यता के साथ मनाया जाएगा। धर्मसंघ के इन दो ऐतिहासिक और गौरवशाली प्रसंगों के उपलक्ष्य में एक विराट त्रि-दिवसीय समारोह समायोजित है। इस गरिमापूर्ण अवसर पर विशाल सुधर्मा सभा में उपस्थित साधु-साध्वियों एवं श्रावक श्राविकाओं द्वारा अपने आराध्य के प्रति विशेष श्रद्धाभिव्यक्ति और मनोहारी प्रस्तुतियां दी जाएंगी। गुरुदेव की पावन सन्निधि और चतुर्विध संघ के अपार जनसैलाब से जैन विश्व भारती की यह तपोभूमि और भी अधिक पावन व ऊर्जावान हो उठी है।

प्रवचन सभा में इंद्रिय और उनके विषयों का गहन विवेचन करते हुए गुरुदेव ने फरमाया कि हमारी पांच इंद्रियों को दो भागों में बांटा जा सकता है – कान और आंख ‘कामी इंद्रियां’ हैं, क्योंकि इनका विषय केवल शब्द और रूप को ग्रहण करना है, जबकि नाक, जीभ और स्पर्श ‘भोगी इंद्रियां’ हैं, जो अपने विषयों (गंध, रस, स्पर्श) के साथ कुछ समय तक संलिप्त रहती हैं। रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द जैसे ये बाह्य पदार्थ स्वयं में इतने शक्तिशाली नहीं हैं कि वे हमारे भीतर राग या द्वेष पैदा कर सकें। ये बाह्य पदार्थ तो केवल निमित्त बनते है, माध्यम बनते हैं, जबकि हमारे भीतर उत्पन्न होने वाले राग-द्वेष का मुख्य कारण’ हमारा मोहनीय कर्म होता है।

मोहनीय कर्म की दो अवस्थाओं सुषुप्त’ और जाग्रत को स्पष्ट करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि एक वीतराग महापुरुष के भीतर मोहनीय कर्म का सर्वथा क्षय हो जाने के कारण, चाहे कितनी भी अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितियां आ जाएं, वे सदैव राग-द्वेष से मुक्त रहते हैं। अतः हमें इंद्रिय विषयों का अनावश्यक उपभोग करने से बचना चाहिए।
सांसारिक काम-भोगों की निस्सार होते है। काम-भोग शल्य और सांप के विष के समान अत्यंत भयंकर और मारक हैं, जो हमारी संयम चेतना को नष्ट कर जीव को दुर्गति की ओर ले जा सकते हैं। परम पूज्य आचार्य श्री तुलसी और आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी का पावन स्मरण करते हुए गुरुदेव ने फरमाया कि गुरू द्वय जनसंपर्क और एकांत ध्यान-साधना दोनों रूपों में मिलकर धर्मसंघ को एक अद्भुत परिपूर्णता प्रदान करते थे। 75 वर्ष की आयु पार करने के पश्चात व्यक्ति को बाहरी जनसंपर्क, लंबी यात्राओं और अनावश्यक भागदौड़ को सीमित कर देना चाहिए। इस अवस्था में भौतिक या द्रव्य चिकित्सा से अधिक आध्यात्मिक चिकित्सा पर ध्यान देते हुए मौन, जप, स्वाध्याय और ध्यान साधना में रमण करना चाहिए। अंत समय में निर्मल भावों के साथ अपनी साधना को पुष्ट करना ही आत्मकल्याण का सर्वश्रेष्ठ मार्ग है।

इस अवसर पर बहिर्विहार से समागत साध्वी वर्धमानश्री जी एवं साध्वी राजश्री जी ने गुरूदेव के समक्ष श्रद्धाभिव्यक्ति दी।

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