जयपुर : निर्माण नगर स्थित एक विद्यालय में आयोजित ‘कर्तव्य निष्ठा’ विषयक प्रवचन सभा में मुनि श्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने कहा कि रामायण केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि कर्तव्यबोध की प्रेरक पोथी है। उन्होंने कहा कि कर्तव्यनिष्ठा मानव जीवन की स्थिरता, उन्नति और सार्थकता का आधार है। कर्तव्य का बोध ही मनुष्य को पशु से अलग पहचान देता है और उसे विशिष्ट बनाता है।
उन्होंने अपने प्रवचन में कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को पहले अपने कर्तव्य और अकर्तव्य का विवेक करना चाहिए, तत्पश्चात कर्तव्य के प्रति जागरूक होकर जीवन को सफल और अर्थपूर्ण बनाना चाहिए। उनके अनुसार कर्तव्यनिष्ठा ही वास्तव में महानता का मार्ग है।
मुनि श्री ने साधु जीवन के संदर्भ में कहा कि साधु का प्रथम कर्तव्य आत्मसाधना और आत्मविकास है। इसी प्रकार प्रत्येक मनुष्य को यह आत्मचिंतन करना चाहिए कि उसका मानव रूप में क्या कर्तव्य है। यदि परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति प्रत्येक नागरिक में कर्तव्यबोध का जागरण हो जाए, तो सर्वोदय की भावना स्वतः साकार हो सकती है।
उन्होंने रामायण के उदाहरणों के माध्यम से कर्तव्य की महत्ता समझाते हुए कहा कि जटायु जैसे तिर्यंच प्राणी ने भी अपने कर्तव्य के लिए प्राणों का उत्सर्ग कर दिया। महाराणा प्रताप के चेतक ने स्वामीभक्ति और कर्तव्यनिष्ठा का ऐसा आदर्श प्रस्तुत किया, जो आज भी प्रेरणास्रोत है। कर्तव्यपालन ही मनुष्य को वास्तविक अर्थों में महान बनाता है।
इस अवसर पर मुनि श्री संभव कुमार जी ने कहा कि प्रकृति स्वयं कर्तव्यबोध का सर्वोत्तम उदाहरण है। यदि मानव प्रकृति से प्रेरणा लेकर अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक हो जाए, तो उसका भविष्य उज्ज्वल हो सकता है।
उन्होंने आगे कहा कि कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति सदैव निर्भय होता है। कर्तव्यच्युत व्यक्ति को ही मृत्यु का भय सताता है, जबकि कर्तव्यपरायण व्यक्ति भय से मुक्त रहता है। कर्तव्य ही मानव जीवन का अमृत है, जिसका आचरण करने से मनुष्य अमरत्व के मार्ग की ओर अग्रसर होता है।
कार्यक्रम का प्रारंभ तीर्थंकर स्तुति के मंगलाचरण से हुआ। इसके पश्चात शक्ति, शांति और समाधि हेतु प्रेक्षाध्यान का प्रयोग कराया गया। अंत में मंगल भावों के साथ मंगलपाठ का उच्चारण कर कार्यक्रम का समापन किया गया।











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