जयपुर : निर्माण नगर स्थित एक विद्यालय के नव-निर्मित संबोधि सभागार में आयोजित धर्मसभा में जैन मुनि श्री ने माँ और गुरु के उपकार को जीवन का सर्वोच्च आधार बताते हुए कृतज्ञता की भावना को आध्यात्मिक उन्नति का मूल बताया।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने कहा कि संसार में माँ और गुरु का उपकार अतुलनीय और अविस्मरणीय होता है। उन्होंने कहा कि इन दोनों के प्रति कृतज्ञ रहना केवल नैतिक कर्तव्य ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक विकास का मार्ग भी है।
उन्होंने अपने प्रवचन में कहा—“आज के कृतघ्नता के वातावरण में कृतज्ञता का भाव कभी-कभी असहज प्रतीत होता है, किंतु कृतज्ञता के बिना विकास की दिशा स्थिर नहीं रह सकती। उपकारी के प्रति आभार व्यक्त करते हुए आगे बढ़ना ही सम्यक और सुदृढ़ विकास का आधार है।”
कार्यक्रम में मुनि श्री संभव कुमार जी ने भी उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि माता-पिता अपने जीवन में संतान से एक अपेक्षा रखते हैं कि वे भविष्य में उनके सहारे बनेंगे। उन्होंने कहा कि वर्तमान पीढ़ी द्वारा इस विश्वास पर खरा उतरने का प्रयास आज एक गंभीर और विचारणीय विषय है। उन्होंने इस दिशा में दोनों पीढ़ियों के लिए उचित मार्गदर्शन और प्रशिक्षण की आवश्यकता पर बल दिया।
मुनि श्री ने छोटे-बड़ों के पारस्परिक व्यवहार पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बड़ों की आज्ञा का सम्मान करना और उनकी भावना का आदर करना छोटे की विनम्रता है, जबकि छोटे का उचित सम्मान और उनके प्रति वात्सल्यपूर्ण व्यवहार बड़ों की उदारता को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि यही शालीनता व्यक्ति को शांति, समाधि और वास्तविक विकास की ओर ले जाती है।
धर्मसभा का शुभारंभ तीर्थंकर अभिनंदन प्रभु की स्तुति से हुआ। इसके बाद प्रेक्षाध्यान एवं जप अनुष्ठान का अभ्यास भी करवाया गया। अंत में “विसर्जन” नामक गेय व्याख्यान की व्याख्या प्रस्तुत की गई। कार्यक्रम का समापन मंगल घोष और कृतज्ञता ज्ञापन के साथ हुआ।
यह धर्मसभा श्रद्धा, अनुशासन और आध्यात्मिक प्रेरणा का एक सशक्त संगम रही, जिसने उपस्थित श्रद्धालुओं को कृतज्ञता और संस्कारों के महत्व का संदेश दिया।













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