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Home आराधना-साधना

महान प्रासाद वाले होते हैं ऋषि : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

शांतिदूत ने ‘ऋषि कैसे हो?’ विषय को किया व्याख्यायित 

ON THE DOT TEAM by ON THE DOT TEAM
May 12, 2026
in आराधना-साधना
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महान प्रासाद वाले होते हैं ऋषि : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण
लाडनूं :जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, शांतिदूत, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी विशाल धवल सेना के साथ वर्तमान में तेरापंथ की राजधानी के रूप में स्थापित लाडनूं की धरा पर योगक्षेम वर्ष का महामंगल प्रवास सुसम्पन्न कर रहे हैं। यह मानों लाडनूं का सौभाग्य है कि तेरापंथ धर्मसंघ में आयोजित हुए अब तक के दो योगक्षेम वर्ष लाडनूं की धरा पर ही समायोजित हुए हैं। इसमें सबसे बड़ी भूमिका यहां बनी जैन विश्व भारती का सुरम्य और भय विशाल आध्यात्मिक परिसर। यह परिसर ज्ञान, ध्यान, साधना, प्रेक्षाध्यान आदि के लिए बहुत ही अनुकूल है। ऐसे में आचार्यश्री के यहां विराजमान हो जाने से देश-विदेश में रहने वाले श्रद्धालुओं के पहुंचने और वहां रहकर अपने आराध्य की आराधना, उपासना करने का क्रम भी निरंतर बना हुआ है।
प्रतिदिन सुधर्मा सभा में आयोजित होने वाला मुख्य प्रवचन कार्यक्रम भी चतुर्विध धर्मसंघ को विशेष ज्ञान देने वाला बन रहा है। नित्य की भांति मंगलवार को मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘ऋषि कैसे हों?’ के आधार पर पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि प्रश्न किया गया कि ऋषि कैसा हो? साधु बन जाना बहुत बड़ी उपलब्धि होती है। अनंतकाल की यात्रा में ऋषित्व प्राप्त हो जाए, मुनित्व मिल जाए, संन्यास उपलब्ध हो जाए तो वह बहुत बड़ी चीज होती है। साधु के जीवन में संयम होना चाहिए। साधु को संयम की मूर्ति, तपोमूर्ति, क्षमामूर्ति हो। एक साधु की बहुत उच्च कोटि की होती है तो कोई उससे कम तो कोई उससे भी कम हो सकता है।
साधु तो अहिंसामूर्ति होता है। वह न तो हिंसा करता है, न कराता है और न ही उसकी कोई अनुमोदना करता है। मन, वचन और काया से साधु को हिंसा का त्याग होता है। यह साधु की अहिंसा की साधना होती है। साधु के पास एक रुपए का भी परिग्रह नहीं होता। साधु के स्वामित्व में कोई जगह-जमीन, मकान आदि नहीं होता। इसके अलावा साधु सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य के पालक होते हैं। इस प्रकार पंच महाव्रतों के पालक साधु होते हैं।
साधु के जीवन में क्षमा भी होनी चाहिए। कोई अवहेलना, अवज्ञा कर दे तो भी साधु के भीतर क्षमा का भाव होना चाहिए। साधु को महान प्रसन्नता वाला होना चाहिए। साधु को गुस्सा ओपता नहीं है। संत वह होता है, जो शांत होता है। संत को गुस्सा, लड़ाई, झगड़ा आदि से बचते हुए आक्रोश से बचने का प्रयास करना चाहिए। साधु को किसी तरह के प्रदर्शन से भी बचने का प्रयास करना चाहिए। साधु को अपनी साधना में समय लगाने का प्रयास करना चाहिए।
साधु का शरीर निर्मल, स्वस्थ रहे। इसके लिए साधु को अपने जिह्वा पर संयम रखने का प्रयास करना चाहिए। सामान्य भोजन उपयोगी हो सकता है। साधु का मन भी प्रसन्न होना चाहिए। साधु का दृष्टिकोण भी अच्छा होना चाहिए। साधु को आग्रही नहीं, अनाग्रही होना चाहिए। साधु में दूसरों की विचारों को भी सुनने का अभ्यास होना चाहिए। इस प्रकार ऋषि को महान प्रासाद वाले होते हैं। साधु-साध्वियों को यथायोग्य धैर्य और शांति रखने का प्रयास करना चाहिए। दीक्षा के पचास वर्ष की सम्पन्नता के संदर्भ में साध्वी शकुंतलाजी को आचार्यश्री ने मंगल प्रवचन के उपरान्त मंगल प्रेरणा प्रदान की।
मंगल प्रवचन कार्यक्रम के दौरान विश्व हिन्दू परिषद के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री आलोक कुमार को आचार्यश्री ने मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। साध्वी शकुंतलाजी के दीक्षा के पचास वर्ष की सम्पन्नता के संदर्भ में अपनी विचाराभिव्यक्ति दी। इस अवसर पर साध्वी शकुंतलाजी ने आचार्यश्री के समक्ष अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी।
विश्व हिन्दू परिषद के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री आलोक कुमार ने आचार्यश्री के दर्शन कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त करने के उपरान्त अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करते हुए कहा कि परम पूज्य युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के चरणों में विनम्र प्रणाम अर्पित करता हूं। उन्होंने आचार्यश्री तुलसी के अवदानों की भी चर्चा की। मैं आचार्यश्री का प्रवचन ही सुनने विशेष रूप से आया हूं और मार्गदर्शन लेने आया हूं। आपसे प्रेरणा लेकर विश्व हिन्दू परिषद भी उसी मार्ग पर चलने का प्रयास करेगा।
आचार्यश्री ने इस संदर्भ में मंगल आशीर्वाद प्रदान करते हुए कहा कि देश के विकास के लिए पांच चीजों की आवश्यकता प्रतीत हो रही है। भौतिक विकास, आर्थिक विकास के अलावा आध्यात्मिक विकास, नैतिकता का विकास तथा शैक्षिक विकास भी हो तो वह राष्ट्र अच्छा राष्ट्र बन सकता है। भारत के नागरिकों में धर्म के संस्कार बने रहें। नशामुक्तता रहे। जीवन में त्याग, संयम का विकास रहे। आपका आज यहां आना हुआ है। बहुत अच्छा स्थान प्राप्त है, इसका अच्छा उपयोग और अच्छे संस्कारों के उन्नयन का प्रयास हो।
मंगल प्रवचन के उपरान्त चित्तौड़गढ़ के सांसद व राजस्थान भाजपा के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष श्री सीपी जोशी ने भी आचार्यश्री के दर्शन कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया।
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