इस सृष्टि में जो दिखाई देता है, वह सदैव सत्य नहीं होता, और जो सत्य होता है, वह प्रायः आँखों से दिखाई नहीं देता। यही जीवन का सबसे गूढ़ रहस्य है। संसार आकर्षणों से भरा है—रूप, वैभव, पद, प्रतिष्ठा, संबंध और इच्छाएँ। मनुष्य इन्हीं चमकते आवरणों को सत्य मान बैठता है, जबकि आत्मा भीतर से उसे किसी और दिशा में पुकारती रहती है। यही द्वंद्व माया और सत्य का है।
सनातन परंपरा में भगवान विष्णु का मोहिनी रूप केवल एक पौराणिक कथा नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन का गहरा संदेश है। जब देवताओं और असुरों के बीच समुद्र मंथन से अमृत निकला, तब दोनों पक्ष उसे पाने को आतुर हो उठे। उस समय भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया—ऐसा रूप, जिसे देखकर असुर विवेक खो बैठे। वे बाहरी सौंदर्य में उलझ गए और अमृत उनके हाथ से निकल गया।
यह प्रसंग केवल असुरों की कथा नहीं, यह हर मनुष्य की कथा है।
आज भी संसार अनेक मोहिनी रूपों में हमारे सामने खड़ा है। कभी धन के रूप में, कभी प्रसिद्धि के रूप में, कभी झूठे संबंधों के रूप में, कभी अहंकार के रूप में। मनुष्य इन आकर्षणों में उलझकर अपने भीतर के अमृत—शांति, संतोष, प्रेम और आत्मज्ञान—को खो देता है। वह बाहर दौड़ता है, पर भीतर खाली रह जाता है।
मोहिनी रूप हमें यह नहीं सिखाता कि सौंदर्य या संसार बुरा है, बल्कि यह सिखाता है कि जिस आकर्षण से विवेक नष्ट हो जाए, वही माया है। संसार में रहना दोष नहीं, संसार में डूब जाना दुख का कारण है।
आत्मा का सत्य इससे भिन्न है। आत्मा न रूप से बंधती है, न वस्तुओं से, न प्रशंसा से, न अपमान से। वह शांत है, प्रकाशमय है, स्थिर है। जब मनुष्य ध्यान, भक्ति, सत्संग और सद्कर्म के माध्यम से भीतर उतरता है, तब उसे ज्ञात होता है कि जिस सुख को वह बाहर खोज रहा था, वह तो भीतर पहले से विद्यमान है।
भगवान विष्णु का मोहिनी रूप एक चेतावनी भी है और एक कृपा भी। चेतावनी इस बात की कि बाहरी चमक से सावधान रहो; कृपा इस बात की कि यदि विवेक जाग जाए, तो माया भी गुरु बन सकती है। जो भ्रम को पहचान लेता है, वही सत्य के निकट पहुँचता है।
आज का मनुष्य तकनीक, उपभोग और प्रतिस्पर्धा के युग में जी रहा है। उसके सामने हर दिन नई-नई मोहिनियाँ खड़ी हैं—चमकदार जीवनशैली, दिखावटी सफलता, तुलना की आग और इच्छाओं का अंतहीन जाल। ऐसे समय में मोहिनी एकादशी का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है—उपवास केवल भोजन का नहीं, बल्कि वासनाओं का भी हो; संयम केवल शरीर का नहीं, विचारों का भी हो।
जब मन मोह से मुक्त होता है, तभी आत्मा का सत्य प्रकट होता है।
अंततः, मोहिनी की लीला हमें यही बताती है कि संसार की माया से भागना नहीं, उसे समझना है। जो समझ गया, वह मुक्त हो गया। जो उलझ गया, वह भटक गया। इसलिए बाहर की मोहिनी को देखने से पहले भीतर के विष्णु को जगाइए। वहीं सत्य है, वहीं अमृत है, वहीं शाश्वत शांति है।













मुख्य समाचार
देश
राज्य-शहर
विदेश
बिजनेस
मनोरंजन
जीवंत

