डेस्क:देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस बीआर गवई ने कहा है कि लैंगिक समानता की दिशा में वास्तविक प्रगति तभी संभव है जब महिलाएँ और पुरुष मिलकर सहयोग करें। उन्होंने जोर देकर कहा कि लैंगिक न्याय हासिल करना केवल महिलाओं की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि पुरुषों को भी अपने पास मौजूद असमान शक्ति साझा करने की आवश्यकता है। यह न केवल किसी के लिए नुकसानदायक नहीं, बल्कि समाज की मुक्ति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
CJI गवई ने ये बातें बुधवार को 30वें जस्टिस सुनंदा भंडारे स्मृति व्याख्यान में “सभी के लिए न्याय: लैंगिक समानता और समावेशी भारत का निर्माण” विषय पर कहीं। उन्होंने कहा, “वास्तविक प्रगति तभी होगी जब पुरुष यह समझेंगे कि सत्ता साझा करना समाज के लिए लाभकारी है। लैंगिक समानता वाले भारत का मार्ग टकराव में नहीं, बल्कि सहयोग में निहित है।”
75 वर्षों की प्रगति का जिक्र
मुख्य न्यायाधीश ने संविधान के लागू होने के बाद से 75 वर्षों में लैंगिक समानता में हुई प्रगति का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि 1975 के बाद राष्ट्रीय विमर्श केवल औपचारिक अधिकारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि महिलाओं की स्वायत्तता, शारीरिक अखंडता और उनके जीवन के अनुभवों को मान्यता देने तक विस्तृत हुआ।
न्यायालयें मानव गरिमा की संरक्षक रही हैं
CJI गवई ने कहा कि नागरिक समाज की सतर्कता, महिला आंदोलनों की दृढ़ता और आम नागरिकों के साहस ने न्यायपालिका को समानता के संवैधानिक वादों के प्रति जवाबदेह बनाए रखा। उन्होंने जोर देकर कहा कि प्रारंभिक संघर्षों से लेकर वर्तमान में सहभागी न्याय के युग तक, अदालतें समानता और मानव गरिमा की रक्षा करती रही हैं।













देश
राज्य-शहर
विदेश
बिजनेस
मनोरंजन
जीवंत
