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पापकारी प्रवृत्तियों से बचने का हो प्रयास : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण

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Home आराधना-साधना

पापकारी प्रवृत्तियों से बचने का हो प्रयास : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण

जन-जन को आशीष प्रदान करते हुए राजेन्द्रनगर पधारे तेरापंथाधिशास्ता 

ON THE DOT TEAM by ON THE DOT TEAM
November 13, 2025
in आराधना-साधना
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पापकारी प्रवृत्तियों से बचने का हो प्रयास : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण
पापकारी प्रवृत्तियों से बचने का हो प्रयास : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण
पापकारी प्रवृत्तियों से बचने का हो प्रयास : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण
राजेन्द्रनगर, साबरकांठा:गुजरात की धरा पर गतिमान जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी वर्तमान में गुजरात की सीमा में गतिमान हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 48 पूज्यचरणों से वर्तमान में पावनता को प्राप्त हो रहा है। आचार्यश्री अब धीरे-धीरे राजस्थान की सीमा के निकट होते जा रहे हैं। आचार्यश्री अब राजस्थान के लाडनूं में स्थित जैन विश्व भारती में योगक्षेम वर्ष की आयोजना के लिए करीब एक वर्ष से भी अधिक समय तक प्रवास करने वाले हैं।
गुरुवार को प्रातःकाल युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने गाम्भोई गांव से मंगल प्रस्थान किया। राष्ट्रीय राजमार्ग पर गतिमान राष्ट्रसंत मानवता का शंखनाद करते हुए निरंतर आगे बढ़ रहे हैं। अनेक स्थानों पर श्रद्धालुओं को अपने मंगल आशीष से लाभान्वित करते हुए लगभग 12 किलोमीटर का विहार कर राजेन्द्रनगर में स्थित एम.एम. चौधरी ऑर्ट्स कॉलेज परिसर में पधारे। कॉलेज से जुड़े हुए लोगों ने युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी का भावभीना स्वागत-अभिनंदन किया।
कॉलेज परिसर में आयोजित मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में अध्यात्मवेत्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आगम के माध्यम से पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि जैन वाङ्मय में एक शब्द आता है- आश्रव। ऐसी प्रवृत्ति अथवा वह भाव, जिसके द्वारा कर्मों का आगमन होता है और जो आत्मा को चिपक जाते हैं, वह आश्रव कहलाता है। बहुत-सी ऐसी प्रवृत्तियां हैं, जिनके माध्यम से आत्मा को पाप कर्म का बंधन हो जाता है। हिंसा, चोरी, झूठ, अहंकार, माया, लोभ आदि आचरणों से आत्मा मलिन बनती है और पापकर्मों का बंध होता है। कर्म करने वाले को ही कर्म का फल भी भोगना होता है। कोई साधु बन जाए और अच्छे ढंग से साधुत्व का पालन करे तो बहुत से पापकर्मों के बंधन से बच सकता है। बच्चों में यह भी संस्कार आए कि बुर कार्यों, पाप कर्मों से चाहिए, ऐसी भावना मजबूत हो जाए तो बच्चे कितने पापों से बच सकते हैं और उनका जीवन भी अच्छा हो सकता है।
आज देश-विदेश, हर गांव, शहर, कस्बे, मुहल्ले आदि में कितने-कितने विद्यालय, उच्च विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय आदि शिक्षण संस्थाएं संचालित हैं और इन संस्थानों के माध्यम से ज्ञान के आदान-प्रदान का कार्य किया जाता है। अनेक भाषाओं में विभिन्न भाषाओं में विभिन्न विषय भी पढ़ाए जाते हैं। इसके साथ-साथ बच्चों को अच्छे संस्कार भी देने का प्रयास करना चाहिए। बच्चों में ईमानदारी की भावना पुष्ट हो, अहिंसा की चेतना का विकास हो। नशा न करने का संकल्प रहे, विनयशीलता हो और उसके उनमें विशेष ज्ञान का विकास भी हो तो ऐसे बच्चे परिवार, देश व समाज के लिए कितने उपयोगी बन सकते हैं। इसके साथ अध्यात्म, साधना व योग आदि का अभ्यास चलना चाहिए। इन सभी प्रयासों के द्वारा बच्चों को शिक्षित बनाने के साथ-साथ संस्कारित भी बनाया जा सकता है। कमाई के लिए पढ़ाई वाली भी बात बुरी नहीं है, किन्तु इसके साथ शिक्षा से अच्छा जीवन जीने के लिए, अच्छे कार्य करने के लिए भी आवश्यक होती है। शिक्षा का अच्छा विकास हो तो दूसरों की भी पवित्र सेवा हो। आसक्ति, लोभ और मोह से बचने का प्रयास करना चाहिए। बच्चों को आवश्यकता और आकांक्षा में अंतर समझना चाहिए। आवश्यकता की पूर्ति हो सकती है, किन्तु आकांक्षाओं की पूर्ति नहीं होती। इसलिए आदमी को अपनी इच्छाओं का सीमाकरण करने का प्रयास करना चाहिए। व्यापार धंधा में ईमानदारी हो। धोखाधड़ी, ठगी और बेइमानी से कमाया हुआ धन अर्थ नहीं, अर्थाभास होता है। बेईमानी और ठगी से कमाया पैसा मलिन होता है और ईमानदारी, मेहनत और सच्चाई से अर्जित किया धन ही वास्तविक धन है। धन के उपभोग में भी संयम रखने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को अपनी इच्छाओं को भी कम करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी अपने कर्त्तव्यों के प्रति जागरूक रहे और अनुशासित जीवनशैली हो तो जीवन सुखी बन सकता है।
आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में उपस्थित साबरकांठा जिले के कलेक्टर श्री ललितभाई ने आचार्यश्री के दर्शन कर अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति देने से पहले उन्होंने आचार्यश्री से अपनी जिज्ञासाएं प्रस्तुत की तो आचार्यश्री ने उसका समाधान भी प्रदान किया। समणी भविकप्रज्ञाजी ने अंग्रेजी भाषा में अपनी अभिव्यक्ति दी। विश्व भारती एजुकेशन संस्थान द्वारा संचालित इस स्कूल के प्रिंसिपल श्री प्रवीणभाई चौधरी ने आचार्यश्री के स्वागत में अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति दी।
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