नई दिल्ली: ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष द्वारा अविश्वास प्रस्ताव लाने की चर्चा के साथ ही लोकसभा के भीतर सियासी हलचल तेज हो गई है। विपक्षी दलों ने सदन के संचालन में पक्षपात का आरोप लगाते हुए अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस देने की बात कही है, जिसके बाद संसद में संख्या बल को लेकर राजनीतिक बहस शुरू हो गई है।
अविश्वास प्रस्ताव की संवैधानिक प्रक्रिया
संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार लोकसभा अध्यक्ष को पद से हटाने के लिए सदन में प्रस्ताव लाया जा सकता है। इसके लिए पहले लिखित नोटिस देना आवश्यक होता है और नियमों के मुताबिक कम से कम 14 दिन का नोटिस अनिवार्य माना जाता है। इसके बाद ही इस प्रस्ताव को सदन में चर्चा के लिए सूचीबद्ध किया जा सकता है।
कितने सांसदों का समर्थन जरूरी
लोकसभा में कुल 543 सदस्य हैं। ऐसे में अध्यक्ष को पद से हटाने के लिए लाए गए प्रस्ताव को पारित कराने के लिए कम से कम 272 सांसदों का समर्थन आवश्यक होगा। यदि प्रस्ताव को इतनी संख्या में समर्थन नहीं मिलता है, तो वह पारित नहीं हो पाएगा।
संख्या बल पर टिकी राजनीतिक लड़ाई
मौजूदा संसदीय गणित पर नजर डालें तो विपक्षी दलों के पास बहुमत से कम सांसद हैं, जबकि सत्तारूढ़ गठबंधन के पास अपेक्षाकृत मजबूत संख्या बल है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वर्तमान परिस्थितियों में विपक्ष के लिए इस प्रस्ताव को पारित कराना आसान नहीं होगा।
विपक्ष के आरोप और सरकार का जवाब
विपक्षी दलों का आरोप है कि उन्हें सदन में अपनी बात रखने के पर्याप्त अवसर नहीं दिए जा रहे हैं और कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा से बचा जा रहा है। इसी को लेकर उन्होंने अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया है।
वहीं सरकार ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि सदन का संचालन पूरी तरह नियमों और संसदीय परंपराओं के अनुसार किया जा रहा है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि प्रस्ताव को लेकर आगे क्या प्रक्रिया अपनाई जाती है और संसद के भीतर इस मुद्दे पर राजनीतिक समीकरण किस दिशा में जाते हैं।













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