लाडनूं : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा के प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने गुरुवार को सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘कैसे बैठें?’ के माध्यम से पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि श्रमण श्रेष्ठ भी हो सकता है, पाप श्रमण भी हो सकता है। महाव्रतों, समति, गुप्तियों के प्रति अच्छी जागरूकता है तो वह श्रेष्ठ श्रमण की कोटि वाला मुनि हो सकता है। महाव्रतों, समिति, गुप्तियों के प्रति लापरवाही है, अजागरूक है, कषाय का भी कुछ प्राबल्य है, वह पाप श्रमण कहलाता है।
साधु की भाषा यथार्थ से ओतप्रोत हो। हालांकि भाव भी महत्त्वपूर्ण होता है, लेकिन भाषा पर भी ध्यान देना आवश्यक होता है। भाव ठीक हों, लेकिन देखने वाला तो व्यवहार ही देख पाता है। आदमी व्यवहार को देख पाता है और भाषा के रूप में बात सामने आती है। आदमी को काया और वचन पर ध्यान देने का प्रयास होना चाहिए। ईर्या समिति में जागरूकता, भाषा समिति में जागरूकता, एषण समिति में जागरूकता रखने का प्रयास हो। इशारा में लोलुपता भी न हो। इसलिए एषणा समिति के प्रति जागरूक रहने का प्रयास करना चाहिए।
साधु को तो जो श्रावक ने बनाया है, उसे ही ग्रहण करने का प्रयास करना चाहिए। स्वादवृत्ति के कारण से किसी प्रकार के इशारे से बचने का प्रयास करना चाहिए। एषणा समिति के प्रति जागरूकता रखने का प्रयास हो। गोचरी में सहज रूप में जो मिल जाए, वह बहुत अच्छी बात होती है। कभी ऊनोदरी कर लेने का प्रयास करना चाहिए। औचित्य के साथ जागरूकता रखने का प्रयास करना चाहिए। दोषों से बचने के प्रति सजगता रहे। उसके बाद भी यदि लगे कि कोई दोष लगने की संभावना हो तो उसकी आलोयणा भी लेने का प्रयास करना चाहिए। बिछौना, कम्बल, आसन आदि पर बिना पूंजे बैठने वाला पाप श्रमण होता है। बिना प्रमार्जन किए हुए बिछौने, कम्बल आदि पर नहीं बैठना चाहिए। उसे देखकर और प्रमार्जन करके ही बैठना चाहिए।
प्रतिलेखन और प्रमार्जन करने का प्रयास होना चाहिए। औचित्यानुसार प्रमार्जन करना चाहिए। जीव हिंसा से बचाव के लिए रजोहरण और प्रमार्जनी का उपयोग होता है। प्रमार्जन साधुचर्या का एक अंग है। सामान्यतया साधु को किसी गृहस्थ के यहां बैठना नहीं चाहिए, लेकिन किसी विशेष परिस्थिति में बैठना हो तो स्थान को बिना देखे, बिना प्रमार्जन किए नहीं बैठना चाहिए। लेटना हो और करवट भी बदला पड़े तो पहले प्रमार्जनी से पूंज करके ही लेटना या करवट बदलना चाहिए। कहीं बैठना हो तो पहले रजोहरण से पूंजना चाहिए और चलना है तो देख-देखकर चलने का प्रयास करना चाहिए। चलते समय वार्तालाप से बचने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार चलने अथवा बैठने में सावधानी और सजगता रखने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार साधु पाप श्रमण नहीं सुश्रमण बनने का प्रयास करे।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं को उत्तरित किया। इसके उपरान्त सघन साधना शिविर के शिविरार्थियों को आचार्यश्री के समक्ष अपनी जिज्ञासाओं को प्रस्तुत करने का अवसर प्राप्त हुआ। आचार्यश्री ने जिज्ञासाओं के उत्तर प्रदान किए।













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