सनातन धर्म में एकादशी तिथि को भगवान विष्णु की आराधना के लिए अत्यंत पवित्र माना गया है। वर्ष भर आने वाली चौबीस एकादशियों के अतिरिक्त जब अधिकमास (पुरुषोत्तम मास) आता है, तब उसमें दो विशेष एकादशियाँ पड़ती हैं—पद्मिनी एकादशी और परमा एकादशी। इनमें पद्मिनी एकादशी को अत्यंत दुर्लभ तथा महान पुण्यदायिनी माना गया है। शास्त्रों के अनुसार इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
युधिष्ठिर का प्रश्न
पौराणिक कथा के अनुसार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, “हे जनार्दन! अधिकमास के शुक्ल पक्ष में आने वाली पद्मिनी एकादशी का क्या महत्व है? इसकी विधि और कथा कृपापूर्वक बताइए।”
तब भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, “हे राजन्! यह एकादशी समस्त व्रतों में श्रेष्ठ है। इसका माहात्म्य स्वयं ब्रह्माजी ने देवर्षि नारद को सुनाया था। जो श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत का पालन करता है, वह सांसारिक कष्टों से मुक्त होकर परम कल्याण को प्राप्त करता है।”
राजा कृतवीर्य और रानी पद्मिनी की कथा
प्राचीन काल में माहिष्मती नगरी में कृतवीर्य नामक एक प्रतापी राजा राज्य करते थे। उनके पास अपार धन, वैभव और सामर्थ्य था, किंतु उन्हें संतान-सुख प्राप्त नहीं था। संतान न होने के कारण राजा और उनकी पत्नी रानी पद्मिनी अत्यंत दुःखी रहते थे।
समय बीतता गया, परंतु उनकी मनोकामना पूर्ण नहीं हुई। अंततः राजा ने राज्य का मोह त्याग दिया और अपनी प्रिय पत्नी पद्मिनी के साथ वन में जाकर कठोर तपस्या करने लगे। उन्होंने अनेक वर्षों तक भगवान की आराधना की, किंतु फिर भी कोई फल प्राप्त नहीं हुआ।
रानी पद्मिनी अपने पति की दिन-प्रतिदिन क्षीण होती अवस्था देखकर अत्यंत चिंतित रहने लगीं। एक दिन उन्होंने महान पतिव्रता और तपस्विनी अनुसूया के आश्रम में जाकर उनसे अपने दुःख का निवेदन किया और संतान प्राप्ति का उपाय पूछा।
अनुसूया का उपदेश
अनुसूया ने रानी से कहा, “हे पुत्री! अधिकमास के शुक्ल पक्ष में आने वाली पद्मिनी एकादशी का व्रत अत्यंत फलदायी है। यदि तुम श्रद्धा, नियम और भक्ति के साथ इस व्रत का पालन करोगी, तो भगवान विष्णु अवश्य प्रसन्न होंगे और तुम्हारी मनोकामना पूर्ण करेंगे।”
अनुसूया के वचनों को सुनकर रानी पद्मिनी ने पूर्ण विधि-विधान से पद्मिनी एकादशी का व्रत किया। उन्होंने उपवास रखा, भगवान विष्णु का पूजन किया, रात्रि में जागरण किया तथा निरंतर भगवान का स्मरण करती रहीं।
भगवान विष्णु का प्रकट होना
रानी की निष्ठा और भक्ति से भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए। वे गरुड़ पर आरूढ़ होकर उनके समक्ष प्रकट हुए और वरदान माँगने को कहा।
रानी ने विनम्रतापूर्वक कहा, “हे प्रभु! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मुझे ऐसा पुत्र प्रदान करें जो संसार में अतुलनीय पराक्रम वाला हो।”
भगवान विष्णु ने “तथास्तु” कहकर उन्हें वरदान दिया। कुछ समय पश्चात् रानी पद्मिनी ने एक तेजस्वी और महान पुत्र को जन्म दिया। वह पुत्र आगे चलकर सहस्रबाहु अर्जुन (कार्तवीर्य अर्जुन) के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसने अपने अद्भुत पराक्रम से समस्त दिशाओं में यश प्राप्त किया।
पद्मिनी एकादशी का महत्व
शास्त्रों में कहा गया है कि पद्मिनी एकादशी का व्रत करने से मनुष्य को अनेक यज्ञों, तीर्थयात्राओं और दानों के समान पुण्य प्राप्त होता है। यह व्रत संतान-सुख, धन, वैभव, आरोग्य और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है। विशेष रूप से अधिकमास में आने के कारण इसका महत्व और भी बढ़ जाता है।
जो व्यक्ति इस दिन उपवास रखकर भगवान विष्णु की पूजा करता है, कथा का श्रवण करता है तथा रात्रि-जागरण करता है, उसके जीवन की अनेक बाधाएँ दूर होती हैं और अंततः उसे भगवान के धाम की प्राप्ति होती है।
व्रत का संदेश
पद्मिनी एकादशी की कथा हमें यह शिक्षा देती है कि सच्ची श्रद्धा, धैर्य और भगवान के प्रति अटूट विश्वास कभी व्यर्थ नहीं जाते। जब मनुष्य निष्ठापूर्वक धर्ममार्ग का अनुसरण करता है, तब ईश्वर उसकी प्रार्थना अवश्य सुनते हैं और उचित समय पर उसकी मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं। यही पद्मिनी एकादशी का आध्यात्मिक संदेश है।













देश
राज्य-शहर
विदेश
बिजनेस
मनोरंजन
जीवंत
