डेस्क: राजस्थान की राजनीति में जून में होने वाले राज्यसभा चुनाव से पहले एक नई सियासी बहस तेज हो गई है। तीन खाली होने वाली राज्यसभा सीटों को लेकर राजनीतिक दल अपनी रणनीति में व्यस्त हैं, वहीं राज्य के कई मुस्लिम संगठनों ने कांग्रेस के सामने जेल में बंद छात्र नेता उमर खालिद को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाने की मांग रखी है। इस कदम ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है और कांग्रेस नेतृत्व की चुप्पी पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मल्लिकार्जुन खड़गे तक पहुंचा ज्ञापन, कांग्रेस पर दबाव
मुस्लिम संगठनों ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को संयुक्त ज्ञापन सौंपा है। ज्ञापन में कहा गया है कि उमर खालिद को राज्यसभा भेजना केवल एक राजनीतिक फैसला नहीं होगा, बल्कि यह कांग्रेस की नागरिक अधिकारों और अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक भी बनेगा। राजनीतिक विश्लेषक इसे पार्टी के लिए एक जोखिम भरा, लेकिन प्रतीकात्मक अवसर मान रहे हैं।
प्रतिनिधित्व का मुद्दा बना चुनावी एजेंडा
मुस्लिम संगठनों का तर्क है कि राजस्थान की आबादी में मुस्लिम समुदाय की हिस्सेदारी करीब 9-10 प्रतिशत है, लेकिन कांग्रेस के मौजूदा सांसदों में एक भी मुस्लिम चेहरा नहीं है। ऐसे में राज्यसभा चुनाव इस कमी को पूरा करने का अवसर बन सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस बार भी समुदाय को प्रतिनिधित्व नहीं मिला, तो कांग्रेस के लिए यह वोट बैंक पर नकारात्मक संदेश जाएगा।
वोट बैंक बनाम टिकट वितरण
राजस्थान मुस्लिम एलायंस के प्रदेश अध्यक्ष मोहसिन राशिद ने कहा कि कांग्रेस को लंबे समय से मुस्लिम मतदाताओं का मजबूत समर्थन मिलता रहा है। 2023 के विधानसभा चुनाव में हर चौथा वोट मुस्लिम समुदाय से आया था और 2024 के लोकसभा चुनाव में भी समर्थन बढ़ा। इसके बावजूद टिकट वितरण में समुदाय की भागीदारी नगण्य रही है। 200 सीटों वाली विधानसभा में सिर्फ 15 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे गए, जबकि लोकसभा चुनाव में एक भी मुस्लिम को टिकट नहीं मिला।
उमर खालिद को क्यों चुना जाए?
संगठनों का कहना है कि 2020 से जेल में बंद खालिद अल्पसंख्यक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता के मुद्दों पर लगातार आवाज उठाते रहे हैं। उनके राज्यसभा में पहुंचने से उन लोगों की आवाज संसद में गूंजेगी, जिनकी आवाज अक्सर दब जाती है।
कांग्रेस के सामने सियासी चुनौती और अवसर
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि कांग्रेस के लिए यह एक चुनौती और अवसर दोनों है। एक तरफ पार्टी को अपने पारंपरिक वोट बैंक को संतुष्ट करने का मौका दिखाई दे रहा है, वहीं दूसरी ओर यह कदम विवाद और मीडिया ट्रैक्शन को भी बढ़ा सकता है।
विधानसभा गणित से बढ़ी अहमियत
मौजूदा राजस्थान विधानसभा में भाजपा के पास 118 विधायक हैं, जबकि कांग्रेस के पास 67 सीटें हैं। तीन में से दो राज्यसभा सीटें भाजपा के खाते में जाने की संभावना जताई जा रही है, वहीं कांग्रेस के लिए केवल एक सीट मिलना तय है। ऐसे में यह सीट कांग्रेस के लिए राजनीतिक और प्रतीकात्मक दोनों रूप से बेहद अहम बन गई है।
सस्पेंस जारी
जैसे-जैसे राज्यसभा चुनाव की तारीख करीब आएगी, इस मुद्दे पर सियासत और तेज होने की संभावना है। सवाल यह है कि क्या कांग्रेस इस मांग को स्वीकार कर बड़ा राजनीतिक संदेश देगी, या सुरक्षित समीकरणों के तहत कोई पारंपरिक चेहरा चुनकर विवाद टालना चाहेगी। फिलहाल इसका जवाब अनुत्तरित है।













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