नई दिल्ली : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्र के नाम संबोधन को लेकर कांग्रेस ने शनिवार को तीखी प्रतिक्रिया दी और इसे राष्ट्रीय संदेश के बजाय चुनावी भाषण करार दिया। कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री ने सरकारी मंच का उपयोग राजनीतिक विरोधियों पर हमला करने के लिए किया, जबकि महिलाओं से जुड़े वास्तविक मुद्दों पर ठोस बात नहीं की।
कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी ने कहा कि प्रधानमंत्री ने देश के मुखिया की तरह नहीं, बल्कि एक चुनाव प्रचारक की तरह संबोधन दिया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय प्रसारण के दौरान प्रधानमंत्री बार-बार विपक्षी दलों, विशेषकर कांग्रेस, का नाम लेते रहे, लेकिन महिलाओं के हितों पर गंभीर चर्चा नहीं की।
रेणुका चौधरी ने कहा कि महिला आरक्षण विधेयक वर्ष २०२३ में पारित हो चुका है। यदि सरकार की नीयत सचमुच महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने की है, तो इसे वर्तमान लोकसभा में ही लागू किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि देश की जनता को भाषण नहीं, जवाब चाहिए।
कांग्रेस सांसद जेबी माथर ने भी प्रधानमंत्री के संबोधन को राजनीतिक भाषण बताते हुए निर्वाचन आयोग से हस्तक्षेप की मांग की। उन्होंने कहा कि यदि प्रधानमंत्री को ऐसा मंच दिया गया है, तो विपक्ष के नेता राहुल गांधी को भी समान अवसर मिलना चाहिए।
उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार को पूर्ण बहुमत के साथ दो कार्यकाल मिले, लेकिन उसने महिला आरक्षण को लागू करने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया। वर्ष २०२३ में सभी दलों ने सर्वसम्मति से विधेयक का समर्थन किया, फिर भी इसे जनगणना और परिसीमन से जोड़ दिया गया।
कांग्रेस सांसद राजीव शुक्ला ने कहा कि राष्ट्र के नाम संबोधन का उपयोग कभी चुनाव प्रचार या राजनीतिक हमलों के लिए नहीं किया जाता, क्योंकि यह सरकारी संसाधनों से संचालित मंच है। उन्होंने कहा कि निर्वाचन आयोग को इस मामले का संज्ञान लेना चाहिए।
राजीव शुक्ला ने आरोप लगाया कि जिन राज्यों में चुनाव चल रहे हैं, वहां विपक्षी दलों को निशाना बनाया जा रहा है, जबकि अन्य राज्यों को छोड़ दिया गया। उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण के नाम पर भाजपा का उद्देश्य केवल वोट बैंक साधना और नए निर्वाचन क्षेत्रों की राजनीति करना है।
कांग्रेस सांसद मल्लू रवि ने प्रधानमंत्री के भाषण को निराशाजनक बताते हुए कहा कि इसमें सच्चाई कम और राजनीतिक आरोप अधिक थे। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सहित कई विपक्षी दल महिला आरक्षण विधेयक पारित कराने के पक्ष में थे, लेकिन सरकार ने इसे परिसीमन से जोड़कर विवाद पैदा किया।
प्रधानमंत्री के संबोधन के बाद कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक टकराव और तेज हो गया है। विपक्ष लगातार इसे चुनावी लाभ के लिए सरकारी मंच के दुरुपयोग का मामला बता रहा है, जबकि सत्तापक्ष इसे महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक पहल बता रहा है।













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