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सामुदायिक जीवन के लिए आवश्यक है व्यवहार कुशलता : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

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Home आराधना-साधना

सामुदायिक जीवन के लिए आवश्यक है व्यवहार कुशलता : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

-‘विवाद की उदीरणा मत करो’ विषय को आचार्यश्री ने किया व्याख्यायित

ON THE DOT TEAM by ON THE DOT TEAM
June 1, 2026
in आराधना-साधना
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सामुदायिक जीवन के लिए आवश्यक है व्यवहार कुशलता : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

लाडनूं : जन-जन के मानस को आध्यात्मिक अभिसिंचन प्रदान करने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने सोमवार को सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘विवाद की उदीरणा मत करो’ को विवेचित करते हुए कहा कि आगम में एक व्यवहार प्रशिक्षण दिया गया है कि सामुदायिक जीवन होता है, जहां संघबद्ध साधना होती है। उस सामूहिक जीवन में विवाद, कलह आदि के उत्पन्न होने का मौका मिल सकता है, किन्तु जहां व्यवहार कुशलता है, जिसके कषाय मंद होते हैं तो वहां बहुत शांति रह सकती है। इसलिए कहा गया है कि विवाद की उदीरणा मत करो।

व्यवहार कौशल का प्रशिक्षण प्राप्त करने और दूसरों को देने का प्रयास करना चाहिए। सामान्य गृहस्थ हो अथवा साधु, किसी को भी विवाद की उदीरणा से बचने का प्रयास करना चाहिए। जो बात शांत हो गई है, उसे दुबारा उकेरना, सामुदायिक जीवन में असमाधि का निमित्त बन सकता है। आदमी को जहां तक संभव हो सौहार्द बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। आदमी की चित्त समाधि स्वयं के पास होती है। व्यवहार और प्रकृति से रूखे साधु-साध्वी को अपने साथ रख लेना भी बड़ी ऊंची बात होती है। यह भी एक प्रकार की सेवा है।

गुरुकुलवास में भी अनेकानेक साझ-वर्ग हैं। किसी को भी अपने साथ रख लेना चाहिए। सामंजस्य की स्थिति बनाए रखने का प्रयास होना चाहिए। थोड़ी कठिनाई सहन करके भी वैसे व्यक्तियों को अपने साथ रख लेना भी बहतु अच्छी सेवा की बात होती है। आदमी को उपशांत कलह की उदीरणा नहीं करनी चाहिए। आदमी में व्यावहारिकता रखने का प्रयास करना चाहिए। कोई बीमार हो तो उसकी सेवा का प्रयास होे। बीमार और वृद्ध संत-साध्वीजी को चित्त समाधि प्रदान करने का प्रयास करें। जहां तक संभव हो दूसरों की सदैव सहायता का भाव होना चाहिए। इस प्रकार आत्मा की दृष्टि से, शांति की दृष्टि से और बाह्य दृष्टि की प्रभावना से भी इसका बहुत महत्त्व है।

साधु जहां रहे, अपने आचार, मर्यादा के प्रति जागरूक रहने का प्रयास करना चाहिए। यह अपनी आत्मा के लिए भी अच्छी बात होती है। गोचरी-पानी आदि विषयों में सजगता रखने का प्रयास करना चाहिए। आचार-मर्यादा के प्रति जागरूकता सफलता का पहला सूत्र है। दूसरी बात होती है-व्यवहार कुशलता। कोई सिंघाड़ा हो, आपस में सदाचार, शालीनता बनी रहे। अपनी बुद्धि का सदुपयोग करने का प्रयास करना चाहिए। अच्छे कार्यों में अपनी बुद्धि और प्रज्ञा का सदुपयोग करने का प्रयास करना चाहिए।

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