लाडनूं : तेरापंथ धर्मसंघ की राजधानी लाडनूं में तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, देदीप्यमान महासूर्य, अखण्ड परिव्राजक, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी विशाल धवल सेना के साथ योगक्षेम वर्ष हेतु विराजमान हैं। लगभग तेरह महीनों के प्रवास के कारण लाडनूं नगर श्रद्धा से ओतप्रोत नजर आ रहा है। जैन विश्व भारती का सुरम्य परिसर तो मानों आध्यात्मिक तीर्थस्थल बना हुआ है। अपने आराध्य की उपासना में चतुर्विध धर्मसंघ का उत्साह देखते ही बन रहा है। नित्य प्रति सुधर्मा सभा में उमड़ने वाली श्रद्धालुओं की भीड़ इस बात को मानों प्रमाणिक बनाती है।
नित्य की भांति शुक्रवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम का शुभारम्भ जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ हुआ। साध्वीवृंद ने प्रज्ञा गीत का संगान किया। तदुपरान्त आचार्यश्री ने चतुर्विध धर्मसंघ को कुछ देर तक ध्यान का प्रयोग कराया।
शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘शिक्षाशील कौन?’ को वर्णित करते हुए कहा कि बहुश्रुत बनने के लिए आदमी को अथवा साधु, साध्वी व समणी को शिक्षाशील बनने का प्रयास करना चाहिए। शिक्षा के क्षेत्र में पुरुषार्थ करने का प्रयास हो। शिक्षा में रुचि रखने वाला व उसका अध्ययन व प्रयास करने वाला शिक्षाशील हो सकता है। पढ़ने की रुचि रखने वाला, अध्ययन में रुचि रखने वाला हो, वह अपने पठन-पाठन में समय का नियोजन करे। हंसी‘-मजाक आदि में ज्यादा रस नहीं लेना चाहिए। शिक्षाशील की आराधना करने वाला इन्द्रियों का भी दमन करे। आदमी को अपने मन भी कन्ट्रोल रखने का प्रयास करना चाहिए। शिक्षाशील की उम्र में शिक्षार्थी को इन्द्रियों का भी संयम रखने का प्रयास करना चाहिए। उसे खानपान में भी संयम रखने का प्रयास करना चाहिए। किसी भाषा का अधिकृत ज्ञान करना है तो आदमी को व्याकरण का ज्ञान करना बहुत ही आवश्यक होता है। व्याकरण का ज्ञान ठीक होता है तो भाषा का सही ज्ञान और सही उच्चारण आदि भी हो सकता है। अध्ययन करने के लिए सीखने का प्रयास होना चाहिए। जिसे सीख लिया, उस ज्ञान का बार-बार चिताड़ना करने का प्रयास करना चाहिए। यदि सीखे हुए ज्ञान को बार-बार नहीं दोहराया जाता है, तो आदमी सीखा हुआ भी भूल सकता है। शिक्षाशील को इन्द्रियों और मन का दमन करने वाला होना चाहिए। परिषद में किसी के दोषों को प्रकाशित नहीं करना चाहिए। आचारहीन नहीं बनना चाहिए। आचार को भी सुन्दर बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए।
शिक्षाशील को शांत रहना चाहिए। उसे क्रोध से भी बचने का प्रयास करना चाहिए। शिक्षाशील को विनय, विनम्र बने रहना चाहिए। शिक्षाशील को सत्यव्रती भी बने रहने का प्रयास करना चाहिए। गृहस्थों को भी शिक्षाशील बनने का प्रयास करना चाहिए।
आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त साध्वी जिनप्रभाजी व साध्वी श्रुतयशाजी ने अपनी आराधक-विराधक विषय पर अपनी अभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने इस विषय पर चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं को प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया। चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं को साध्वीद्वय ने उत्तरित करने का प्रयास किया। तदुपरान्त आचार्यश्री की अभ्यर्थना में छोटी समणीवृंद ने अपनी रोचक प्रस्तुति दी।













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