सोमवार को शिव-पूजा सामान्यतः एक धार्मिक कर्मकांड के रूप में देखी जाती है—जल, बेलपत्र, धूप, दीप और व्रत। परंतु यदि शिव को केवल पूजा की विधि में सीमित कर दिया जाए, तो यह उनके तत्व के साथ अन्याय होगा। शिव किसी एक दिन, एक व्रत या एक विधि में बंधने वाले देव नहीं हैं। सोमवार, वास्तव में, उपवास का नहीं बल्कि आत्मानुशासन का प्रतीक है।
शिव का स्वरूप बाह्य आडंबर से परे है। वे कैलास पर विराजमान तपस्वी भी हैं और संसार के मध्य नृत्यरत महाकाल भी। उनका जीवन बताता है कि संयम और स्वतंत्रता परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। सोमवार का व्रत इसी संतुलन की स्मृति कराता है—जहाँ इंद्रियों पर संयम है, पर जीवन से पलायन नहीं।
सोमवार ‘सोम’ से जुड़ा है—चंद्रमा से। चंद्रमा मन का प्रतीक है, और शिव चंद्रशेखर हैं। अर्थात शिव वही हैं जो मन को धारण करते हैं, उसे नियंत्रित करते हैं, उसे पूर्णिमा और अमावस्या—दोनों में स्वीकार करते हैं। सोमवार का अनुशासन मन को साधने का प्रयास है। उपवास केवल भोजन का त्याग नहीं, बल्कि विकारों, आवेगों और असंतुलन से विराम लेने का अभ्यास है।
शिव-भक्ति में मौन का विशेष स्थान है। शिव स्वयं मौन हैं—ध्यानस्थ, स्थिर, अविचल। सोमवार का सार भी यही है कि व्यक्ति कुछ समय के लिए स्वयं के शोर से दूर हो। जब मन बोलना बंद करता है, तभी चेतना सुनना आरंभ करती है। यह मौन ही वास्तविक पूजा है।
आज के युग में, जब धर्म को प्रदर्शन और प्रतिस्पर्धा में बदल दिया गया है, सोमवार हमें स्मरण कराता है कि शिव को दिखावे की नहीं, समझ की आवश्यकता है। वे सरल हैं, पर सहज नहीं; भोले हैं, पर अचेत नहीं। उनका व्रत करना आसान है, पर उनके जैसा संयमी होना कठिन।
सोमवार का अर्थ है—अपने भीतर झाँकने का साहस। यह पूछने का दिन कि क्या हम अपने क्रोध, लालसा और अहंकार पर उतना ही नियंत्रण रखते हैं जितना अपने भोजन पर। यदि नहीं, तो व्रत अधूरा है।
शिव का व्रत वस्तुतः आत्मा का अनुशासन है—जहाँ व्यक्ति स्वयं को रोकता नहीं, बल्कि स्वयं को समझता है। यही सोमवार की साधना है, यही शिव-तत्व का मर्म।













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