जयपुर :आचार्य श्री महाश्रमण जी के सुशिष्य मुनि श्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने कहा कि समता धर्म, आत्मशुद्धि और सुखी जीवन का मूल आधार है। समता न केवल आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करती है, बल्कि व्यवहार की विशुद्धि और तनावमुक्त जीवन का भी अमोघ साधन है। उन्होंने कहा कि जहां सहनशीलता होती है, वहीं समता का विकास संभव है और सहनशीलता ही समता की वास्तविक नींव है।
अजमेर रोड स्थित तिवाड़ी कॉलोनी में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री ने “समता का व्यावहारिक एवं आध्यात्मिक महत्त्व” विषय पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में मानसिक तनाव, अशांति और संबंधों में बढ़ती कटुता का प्रमुख कारण असहनशीलता और प्रतिक्रिया-प्रधान जीवनशैली है। समता का अभ्यास व्यक्ति को इन समस्याओं से मुक्त कर सकता है।
मुनि श्री तत्त्व रुचि जी ने समता और सहिष्णुता की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा, “सहन करो, सफल बनो और समता धरो, सुखी बनो।” उन्होंने बताया कि जीवन में सफलता उन्हीं लोगों को प्राप्त होती है जो विपरीत परिस्थितियों को धैर्यपूर्वक सहन करना जानते हैं। इसी प्रकार स्थायी सुख और शांति भी वहीं संभव है जहां समता का व्यवहार हो। उन्होंने कहा कि प्रतिक्रिया से संचालित जीवन समता को नष्ट कर देता है और प्रतिक्रिया ही तनाव तथा अशांति का बड़ा कारण बनती है।
इस अवसर पर मुनि श्री संभव कुमार जी ने कहा कि जिन लोगों को हर बात में टोका-टोकी और टीका-टिप्पणी करने की आदत होती है, वे स्वयं भी अशांत रहते हैं और दूसरों की शांति भी भंग करते हैं। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और सौहार्दपूर्ण जीवन के लिए परस्पर सहनशीलता आवश्यक है। सहनशीलता ही शांति का आधार है और समता धर्म की सर्वोपरि साधना है। उपवास, तप, जप और अन्य धार्मिक साधनाएं भी तभी सार्थक होती हैं जब उनके साथ समता का भाव जुड़ा हो।
धर्मसभा का शुभारंभ तीर्थंकर विमल प्रभु की स्तुति से हुआ। कार्यक्रम के दौरान श्रद्धालुओं ने तप, जप और ध्यान का लाभ प्राप्त किया। अंत में मंगल पाठ के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।













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