श्रीलंका अपने सबसे बुरे आर्थिक संकट और राजनीतिक उथल-पुथल से गुजर रहा है। पीएम महिंदा राजपक्षे को इस्तीफा देना पड़ा है और राष्ट्रपति गोताबाया राजपक्षे पर इस्तीफा देने का जबरदस्त दबाव है। लेकिन क्या आपको पता है कि महिंदा राजपक्षे और गोताबाया राजपक्षे को श्रीलंका में नायक के तौर पर देखा जाता रहा है लेकिन अब उन्हें विलेन के तौर पर देखा जा रहा। श्रीलंका कई सालों तक गृहयुद्ध में फंसा रहा और महिंदा और गोताबाया राजपक्षे को इस गृहयुद्ध को खत्म करवाने वाले के तौर पर देखा जाता है।
2019 में राष्ट्रपति बने थे गोताबाया राजपक्षे
महिंदा राजपक्षे श्रीलंका के सबसे बड़े नेताओं में से गिने जाते हैं। राजनीति में कई सालों तक रहने के बाद वह 2004 में पीएम बने और 2005-15 तक राष्ट्रपति रहे। 2018 में महिंदा एक बार फिर कुछ दिनों के लिए पीएम बने और 2019 में जब गोताबाया राजपक्षे राष्ट्रपति बने तो 2020 में महिंदा फिर पीएम चुन लिए गए। इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट बताती है कि श्रीलंका की राजनीति में महिंदा और गोताबाया राजपक्षे इसलिए भी शक्तिशाली होते चले गए क्योंकि उनके पिता डॉन एल्विन राजपक्षे श्रीलंका फ्रीडम पार्टी के संस्थापक सदस्य थे। वह दो बार सांसद भी रहे थे।
अलगावादी विद्रोह को कुचलने के लिए लिया जाता है गोताबाया और महिंदा का नाम
महिंदा राजपक्षे को तमिल अलगाववादी विद्रोहियों को कुचलने के लिए टर्मिनेटर का नाम दिया गया था और इस अलगावादी विद्रोह को कुचलने के लिए महिंदा के राइट हैंड मैन थे गोताबाया राजपक्षे। उन्होंने श्रीलंका आर्म्ड फोर्स को लीड किया और तमिल टाइगर्स का सफाया कर दिया। 1998 में गोताबाया अमेरिका चले गए थे फिर 2005 में वह वापस श्रीलंका लौटे और चुनाव में भाई महिंदा राजपक्षे की मदद की।
राजपक्षे की दिक्कत की शुरुआत
2019 में जब गोताबया श्रीलंका के राष्ट्रपति बने तो उन्होंने महिंदा राजपक्षे को पीएम बनाया। इसके साथ ही उन्होंने राजपक्षे परिवार के दर्जनों लोगों को श्रीलंका की राजनीति में टॉप पोस्ट पर बिठा दिया। इसमें तुलसी, चमल, नमल, योषिता, बासिल आदि प्रमुख रहे। परिवारवाद, भ्रष्टाचार, आर्थिक कुप्रबंधन और चीनी कर्ज पर बढ़ती निर्भरता आदि के कारण राजपक्षे परिवार आम लोगों के बीच अलोकप्रिय होता गया।
आतंकी हमला और फिर कोविड ने श्रीलंका की इकॉनमी को हिला दिया
2019 में श्रीलंका में भयंकर आतंकी हमला हुआ। इसमें 261 आम लोग मारे गए। श्रीलंका की इकॉनमी पर्यटन पर बहुत निर्भर है। इस आतंकी हमले के बाद श्रीलंका में टूरिस्ट आने कम हो गए। फिर 2020 में कोरोना वायरस के कारण श्रीलंका के पर्यटन उद्योग को भयंकर नुकसान पहुंचा और यह नुकसान बढ़ता ही गया। विदेशी मुद्रा घटती चली गई। इस सबके दौरान श्रीलंका चीन के करीब जाता गया और कर्ज में डूबता गया।
तो अब आगे क्या?
श्रीलंका में इमरजेंसी जैसे हालात हैं। महिंदा राजपक्षे ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है और गोताबाया पर इस्तीफा देने का दबाव है। गोताबाया विरोध-प्रदर्शन रोकने के लिए हर संभव कोशिश करते दिख रहे हैं लेकिन अब तक नाकाम रहे हैं। उन्होंने एक मिलीजुली सरकार बनाने की अपील की है लेकिन विपक्षी दलों ने गोताबाया से हाथ मिलाने से इनकार कर दिया है। श्रीलंका पर नजर रखने वाले एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर अगले कुछ दिनों में श्रीलंका के हालात नहीं सुधरते हैं तो बहुत संभव है कि श्रीलंका में सैन्य सरकार दिखे।













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