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सरलता से होती है आत्मा की शुद्धि : अध्यात्म वेत्ता आचार्यश्री महाश्रमण

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Home आराधना-साधना

सरलता से होती है आत्मा की शुद्धि : अध्यात्म वेत्ता आचार्यश्री महाश्रमण

आगमाधारित प्रवचन के द्वारा मुम्बई की जनता हो रही लाभान्वित  

ON THE DOT TEAM by ON THE DOT TEAM
August 2, 2023
in आराधना-साधना
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सरलता से होती है आत्मा की शुद्धि : अध्यात्म वेत्ता आचार्यश्री महाश्रमण
सरलता से होती है आत्मा की शुद्धि : अध्यात्म वेत्ता आचार्यश्री महाश्रमण
सरलता से होती है आत्मा की शुद्धि : अध्यात्म वेत्ता आचार्यश्री महाश्रमण
सरलता से होती है आत्मा की शुद्धि : अध्यात्म वेत्ता आचार्यश्री महाश्रमण
शुभ और अशुभ नाम कर्म बंध के कारणों का युगप्रधान आचार्यश्री ने किया वर्णन  
पूज्य कालूगणी की मालवा प्रदेश की यात्रा का आचार्यश्री ने सरसशैली में किया वाचन  
मुंबई:68 वर्षों बाद मुम्बई महानगर में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी का चतुर्मास हो रहा है। यह चतुर्मास पांच महीने का है। इसके उपरान्त भी आचार्यश्री ने मुम्बईवासियों पर विशेष कृपा बरसाते हुए वर्ष 2024 का मर्यादा महोत्सव तक समय भी बृहत्तर मुम्बई क्षेत्र के अंतर्गत वासी-नवी मुम्बई में करने की घोषणा भी कर दी है। अपने आराध्य की इतनी कृपा को प्राप्त मुम्बईवासी मानों कृत-कृत्य हो गए हैं। मुम्बईवासी अपने आराध्य की सेवा में तन्मयता के साथ जुटे हुए हैं। साथ ही अपने आराध्य की मंगलवाणी से अपने जीवन के कल्याण का प्रयास भी कर रहे हैं। आचार्यश्री भी श्रद्धालुओं पर विशेष कृपा बरसाते हुए नित्य प्रति भगवती सूत्र जैसे विशालकाय आगम के द्वारा नित्य नवीन पथ को उजागर कर रहे हैं।
तीर्थंकर समवसरण में बुधवार को उपस्थित जनता को अध्यात्मवेत्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने भगवती सूत्र आगम के माध्यम से पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि आठ कर्मों में छठा है नाम कर्म। नाम कर्म के द्वारा शरीर की सुन्दरता, वाणी का प्रभाव, तीर्थंकर जैसी स्थिति भी नाम कर्म से प्राप्त होने वाली स्थिति है। नाम कर्म के दो प्रकार होते हैं- शुभ नाम कर्म और अशुभ नाम कर्म। शुभ नाम कर्म के उदय से अनुकूल स्थितियां प्राप्त होती हैं। अशुभ नाम कर्म के उदय से जीव को प्रतिकूल परिस्थितियां प्राप्त होती हैं। भगवती सूत्र में प्रश्न किया गया कि शुभ नाम कर्म का बंध किन कारणों से होता है। उत्तर प्रदान करते हुए बताया गया कि काय ऋजुता, भावात्मक ऋजुता, भाषा ऋजुता आदि से शुभ नाम कर्म का बंध होता है। आदमी शरीर से भी ऋजु, भावों से भी ऋजु और भाषा में ऋजुता अर्थात् कथनी-करनी में समानता, भाषा से भी छल न हो तो शुभ नाम कर्म का बंध होता है। सरलता होती है तो शुभ नाम कर्म का बंध होता है। आदमी को बच्चे की भांति सरलता होनी चाहिए, किन्तु बच्चों की तरह नादानी नहीं होनी चाहिए। सभी बातों के सार के रूप में कहा जाए तो सरलतापूर्ण व्यवहार हो तो शुभ नाम कर्म का बंध होता है। अशुभ नाम कर्म बंध होने का कारण सरलता के विपरित वक्रता, कुटिलता, मायाचार, धोखा, ठगी से अशुभ नाम कर्म का बंध होता है। इससे आदमी के जीवन में प्रतिकूलताएं प्राप्त होती हैं। शुभ नाम कर्म बंध के उदय से आदमी को अनुकूल स्थितियां प्राप्त होती हैं। उसके नाम ख्याति में वृद्धि होती है, उसकी बातों का लोग श्रवण करते हैं। उसकी आदेशात्मक वाणी का सभी अनुपालन करते हैं और अशुभ कर्म बंध के कारण आदमी को जीवन में प्रतिकूलताएं प्राप्त होती हैं।
आदमी को इस संदर्भ में यह विशेष प्रेरणा लेने का प्रयास करना चाहिए कि ऋजुतापूर्ण व्यवहार आत्मा का उत्थान कराने वाले और वक्रतापूर्ण व्यवहार आत्मा का पतन कराने वाले होते हैं। आत्मा के उत्थान के लिए आदमी को ऋजुतापूर्ण व्यवहार करने का प्रयास करना चाहिए। सरलता से शुद्धि होती है और शुद्ध आत्मा ही उत्थान की दिशा में गति कर सकती है।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने कालूयशोविलास के आख्यानमाला के क्रम को आगे बढ़ाते हुए आचार्यश्री कालूगणी की मालवा प्रदेश की यात्रा का वर्णन किया। आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में एक ही परिवार की श्रीमती अंकिता बड़ाला ने 33, श्रीमती रिंपल बड़ाला ने 31 व श्रीमती सारिका बड़ाला ने 24 की तपस्या का प्रत्याख्यान किया।

मुनि दिनेशकुमारजी ने फरमाया कि मनुष्य जीवन की दुर्लभता के अनेक माप दंड हे, क्योंकि मनुष्य क्षेत्र बहुत छोटा होता है लेकिन देव जीवन काफी विशालमय है । 26 वें देवलोक के अंदर सातवे नरक गति में जीव भरे हुए है, तिर्यंच गति के गुण मनुष्य गति के गुणांक से कही गुणा अधिक है । त्रसकाय गति के बाहर कोई जीव नहीं होते, जहां हम रह रहे है वहां हमारा मध्यकाल होता है यह भगवान द्वारा कहा गया की मध्यकाल में मेरुपर्वत है जो जंबू दीप के मध्य में हे । मनुष्य गति में जीव कम होने के कारण त्याग की भावना रखने से कई गलतियों से मुक्ति का मार्ग थोड़ा बहुत खुल जाता है वह व्यक्ति श्रावक कहलाता है ।

सामायिक व्रत या सामान्य समय के रूप में व्रत में त्याग करने सेलाग्ने वाले कर्मो के त्याग से मुक्ति का मार्ग कम हो सकता है। तेरापंथ के नाम पर आचार्य भिक्षु ने कहा प्रभु यह तेरापंथ है हम तो पथिक है,तब से प्रभो यह तेरापंथ कहलाया । संतोष जी सेठिया भी गुरुदेव द्वारा तत्व संबंधी ज्ञान प्राप्त कर तेरापंथी श्रावक बने । आधी व्याधि की माया, मिटे प्रेत की छाया । आत्म शक्ति जग जाए, लघु भी बने महान । तन्मय बनकर तुलसी करू सदा संगान, मन मंदिर में आओ धरू निरंतर ध्यान जय महावीर भगवान…

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