नई दिल्ली: दुनिया भर के केंद्रीय बैंक अब अमेरिकी डॉलर पर अपनी निर्भरता को धीरे-धीरे कम करते हुए सोने के भंडार को तेजी से बढ़ा रहे हैं। जर्मन बैंक के अनुसंधान संस्थान की एक रिपोर्ट में यह बड़ा बदलाव सामने आया है, जो वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण संरचनात्मक परिवर्तन का संकेत देता है।
रिपोर्ट के अनुसार, लंबे समय से चला आ रहा वह रुझान अब उलट रहा है जिसमें अमेरिकी डॉलर वैश्विक भंडारों में प्रमुख मुद्रा माना जाता था। इसमें कहा गया है कि वैश्विक केंद्रीय बैंक भंडार में डॉलर की हिस्सेदारी अपने उच्चतम स्तर लगभग 60 प्रतिशत से गिरकर अब करीब 40 प्रतिशत तक आ चुकी है।
इसके विपरीत, सोने की हिस्सेदारी में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। रिपोर्ट बताती है कि पिछले चार वर्षों में केंद्रीय बैंक भंडारों में सोने की हिस्सेदारी लगभग दोगुनी होकर करीब 30 प्रतिशत तक पहुंच गई है। यह बदलाव वैश्विक भंडार संरचना में एक महत्वपूर्ण पुनर्संतुलन को दर्शाता है।
रिपोर्ट का एक अहम निष्कर्ष यह भी है कि डॉलर से निकाली जा रही हिस्सेदारी अन्य मुद्राओं की ओर नहीं जा रही, बल्कि सीधे सोने में स्थानांतरित हो रही है। यानी, केंद्रीय बैंक अब अन्य विदेशी मुद्राओं की बजाय सुरक्षित परिसंपत्ति के रूप में सोने को अधिक प्राथमिकता दे रहे हैं।
विशेष रूप से यह प्रवृत्ति उभरती अर्थव्यवस्थाओं में अधिक दिखाई दे रही है। रिपोर्ट के अनुसार, सभी केंद्रीय बैंक द्वारा की जा रही सोने की खरीदारी मुख्य रूप से इन्हीं देशों से हो रही है। पिछले एक दशक में इन देशों ने लगातार अपने स्वर्ण भंडार को बढ़ाया है।
रिपोर्ट में इस बदलाव को केवल आर्थिक कारणों से नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक परिस्थितियों से भी जोड़ा गया है। इसमें कहा गया है कि वैश्विक भंडारों में सोने की बढ़ती हिस्सेदारी का संबंध अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक तनावों और बदलते वैश्विक गठबंधनों से है।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान वैश्विक स्थिति को 1990 और 2000 के दशक की अपेक्षाकृत स्थिर व्यवस्था से अलग एक नए दौर के रूप में देखा जा रहा है, जिसे एक प्रकार से “इतिहास की वापसी” कहा गया है। इसके अनुसार, वैश्विक व्यवस्था अब अधिक अनिश्चितता और प्रतिस्पर्धा की ओर बढ़ रही है।
उभरती अर्थव्यवस्थाएं ऐसे माहौल में अपने भंडारों की सुरक्षा के लिए सोने को प्राथमिकता दे रही हैं, क्योंकि यह संपत्ति घरेलू स्तर पर सुरक्षित रखी जा सकती है और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों या बाहरी दबावों से अपेक्षाकृत कम प्रभावित होती है।
भविष्य को लेकर रिपोर्ट में यह संभावना भी जताई गई है कि यदि यही रुझान जारी रहता है, तो वैश्विक भंडारों में सोने की हिस्सेदारी और बढ़ सकती है। कुछ परिदृश्यों में यह 40 प्रतिशत तक पहुंच सकती है।
इसके अलावा, सोने की बढ़ती मांग का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर भी पड़ सकता है और आने वाले वर्षों में इसकी कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी जा सकती है।
कुल मिलाकर, यह रिपोर्ट वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में एक बड़े बदलाव की ओर इशारा करती है, जहां देश पारंपरिक डॉलर-आधारित व्यवस्था से हटकर सोने को एक रणनीतिक और सुरक्षित भंडार के रूप में अधिक महत्व दे रहे हैं।













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