पुणे:मानव जीवन में ज्ञान का बहुत महत्त्व है। ज्ञान विकास का एक बड़ा साधन स्वाध्याय है। जैन साधना पद्धति में तपस्या के बारह प्रकार बताए गए हैं, उनमें दसवां प्रकार स्वाध्याय को बताया गया है। स्वाध्याय को इतना महत्त्व दिया गया है कि एक दिन के आठ प्रहर में से चार प्रहर में स्वाध्याय करने की प्रेरणा दी गई है। दो प्रहर ध्यान तथा दो प्रहर को शारीरिक संरक्षण को दिया गया है। एक दिन का पचास प्रतिशत समय स्वाध्याय के लिए निर्धारित किया गया है। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि शास्त्रकार ने स्वाध्याय को कितना महत्त्व दिया है। हालांकि किन्हीं परिस्थितियों में सापेक्ष बात भी हो सकती है। सेवा के लिए कई बार स्वाध्याय को गौण करना हो सकता है। ऐसा साधु समुदाय के लिए बताया गया है। साधु समुदाय में जो शैक्ष हैं, उन्हें और अधिक स्वाध्याय का समय देने का प्रयास करना चाहिए। व्यवस्था और सेवा से जुड़े हुए चारित्रात्माओं को सेवा और व्यवस्था को भी ध्यान देने का प्रयास करना चाहिए।
कब किसका कहां प्रयोग करना यह भी योजनाबद्ध ढंग से हो तो कार्य अच्छा हो सकता है। कोई साधु भले ज्ञान वाला न हो, किन्तु वह शरीर से पुष्ट, सेवा देने में तत्पर हो तो उसका भी अपना महत्त्व रखता है। जिसकी जहां उपयोगिता उसे उस रूप में नियोजित कर दिया जाए तो उसका जीवन सार्थक और सफल हो सकता है। कोई गीत संगान में निपुण हो, कोई कला में दक्ष हो, कोई व्यवस्था आदि करने में निपुण है तो उसके अनुसार उसे कार्य में लगाया जाए तो वह खास बात हो सकती है। भले कोई ज्ञानी भी हो तो संघ में सेवा की भावना रखने का प्रयास करना चाहिए। सेवा करने के लिए तत्पर भी होना चाहिए।
स्वाध्याय के द्वारा अपने समय को सार्थक बनाने का प्रयास करना चाहिए। स्वाध्याय के समान कोई तप नहीं बताया गया है। इसलिए गृहस्थ को भी अपने ज्ञान के विकास के लिए स्वाध्याय करने का प्रयास करना चाहिए। अपनी योग्यता के अनुसार स्वाध्याय किया जाता है। संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी आदि-आदि अनेक विषयों का ज्ञान, आगमों के अनुवाद, टिप्पण आदि का भी स्वाध्याय किया जा सकता है। स्वाध्याय के साथ ध्यान को जोड़ा जा सकता है। ज्ञान का विकास होता है तो यह स्पष्ट हो जाता है कि हमें क्या करना और क्या नहीं करना चाहिए। यह स्पष्ट हो जाने पर आदमी कल्याण की दिशा में आगे बढ़ सकता है। इसलिए मानव को निरंतर ज्ञान के विकास का प्रयास करना चाहिए।
उक्त पावन प्रेरणा जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पुणे शहर के प्रवास के अंतिम दिन अर्थात् मंगलवार को सिमंधर समवसरण में उपस्थित जनता को प्रदान की। आचार्यश्री ने मंगल प्रवचन के उपरान्त कहा कि आज पुणे प्रवास का अंतिम दिन है। यहां से आगे के लिए प्रस्थान होगा। यहां के लोगों में धार्मिक चेतना बनी रहे। साध्वीप्रमुखाजी को यहीं पुणे में रखने का निर्णय किया है। आचार्यश्री के इस निर्णय को सुनकर जनता ने बुलंद जयघोष किया।
आचार्यश्री के मंगल प्रवचन व प्रेरणा के उपरान्त साध्वीवर्याजी ने जनता को उद्बोधित किया। साध्वी मंगलप्रज्ञाजी ने भी अपने हृदयोद्गार व्यक्त किए। तदुपरान्त सहवर्ती साध्वियों के साथ गीत का संगान किया। साध्वी उज्जवलप्रभाजी ने भी अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति दी। श्री संजय मरलेचा ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। दिव्यांग बालक प्रथमेश सिन्हा ने भी आचार्यश्री के समक्ष अपनी अभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने बालक को अभिप्रेरित भी किया।












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