डेस्क : तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में जारी राजनीतिक संकट के बीच पार्टी में बगावत को लेकर भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद सी.एम. रमेश का नाम चर्चा में है। राजनीतिक गलियारों में यह दावा किया जा रहा है कि टीएमसी के असंतुष्ट सांसदों और भाजपा नेतृत्व के बीच संवाद स्थापित करने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालांकि, इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
सूत्रों के अनुसार, टीएमसी के 19 लोकसभा सांसदों का एक समूह स्वयं को “वास्तविक तृणमूल” के रूप में मान्यता दिलाने की तैयारी कर रहा है। बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष से मिलने का कार्यक्रम बनाया है और वे संसद में अलग पहचान की मांग कर सकते हैं। यदि ऐसा होता है तो यह ममता बनर्जी के नेतृत्व के लिए बड़ा झटका माना जाएगा।
बताया जा रहा है कि बागी गुट भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को समर्थन देने के विकल्प पर भी विचार कर रहा है। बागियों का दावा है कि उनके साथ टीएमसी के दो-तिहाई से अधिक सांसद हैं, जबकि ममता बनर्जी खेमे ने इन दावों को खारिज करते हुए इसे भाजपा की राजनीतिक रणनीति बताया है।
टीएमसी नेतृत्व पार्टी को एकजुट रखने की कोशिश में जुटा है। पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी ने हाल के दिनों में कई महत्वपूर्ण बैठकें की हैं और सांसदों से संपर्क बनाए रखा है। वहीं, कुछ नेताओं ने सार्वजनिक रूप से ममता बनर्जी के प्रति अपनी निष्ठा भी दोहराई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन के बाद शुरू हुई अंदरूनी असंतुष्टि अब खुलकर सामने आ रही है। पहले विधायकों के एक बड़े समूह द्वारा अलग रुख अपनाने और अब सांसदों में असंतोष की खबरों ने टीएमसी के सामने संगठनात्मक चुनौती खड़ी कर दी है।
यदि बागी सांसद अपने दावे के अनुरूप संख्या बल दिखाने में सफल रहते हैं, तो संसद और पश्चिम बंगाल की राजनीति दोनों में इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। आने वाले दिनों में लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष होने वाली संभावित पेशी और बागी गुट के अगले कदम पर राजनीतिक हलकों की नजर बनी हुई है।













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