नई दिल्ली : केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की तीन भाषा नीति को लेकर चल रही सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भाषा की परिभाषा और वर्गीकरण को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने सवाल उठाया कि क्या अंग्रेजी को भारतीय मूल (Indigenous) भाषा माना जा सकता है और इस विषय पर दोबारा विचार करने की आवश्यकता हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट में CBSE की तीन भाषा नीति को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई हुई। इस दौरान अदालत ने कहा कि किसी भाषा को भारतीय या स्थानीय भाषा मानने की परिभाषा स्पष्ट होनी चाहिए। न्यायालय ने “नेटिव भाषा” की व्याख्या को लेकर भी सवाल उठाए और इस मुद्दे पर पुनर्विचार की जरूरत बताई।
CBSE की नई तीन भाषा नीति के तहत छात्रों को तीन भाषाओं का अध्ययन करना होगा। इसमें कम से कम दो भाषाएं भारतीय भाषाएं रखने का प्रावधान किया गया है। नीति का उद्देश्य छात्रों को भारतीय भाषाओं से जोड़ना और बहुभाषी शिक्षा को बढ़ावा देना बताया गया है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने नीति को लागू करने में आने वाली व्यावहारिक समस्याओं का मुद्दा उठाया। इनमें पर्याप्त शिक्षकों की उपलब्धता, पाठ्य सामग्री और छात्रों पर बढ़ने वाले शैक्षणिक दबाव जैसी चिंताएं शामिल हैं।
वहीं CBSE की ओर से कहा गया कि नई व्यवस्था राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के उद्देश्यों के अनुरूप है और इसका उद्देश्य छात्रों को अधिक भाषाई विकल्प उपलब्ध कराना है। बोर्ड के अनुसार, भारतीय भाषाओं के अध्ययन से छात्रों की सांस्कृतिक समझ और ज्ञान का विस्तार होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस नीति पर रोक लगाने से इनकार किया है। अदालत ने कहा कि भाषा सीखना कभी नुकसानदायक नहीं होता और मामले की आगे की सुनवाई जारी रहेगी।













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